एक सुंदर से गाँव में माया नाम की एक लड़की रहती थी। वह बहुत ही दयालु थी और उसका मन एक साफ़ बहती नदी की तरह शांत और सुंदर था। उसकी मुस्कान पूरे गाँव में खुशियाँ बाँटती थी।
माया की एक बहुत अच्छी सहेली थी, सारा। लेकिन एक छोटी सी बात पर सारा ने माया का साथ छोड़ दिया और उसे उस समय अकेला छोड़ दिया जब उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। इस बात ने माया को अंदर तक तोड़ दिया।
दिन बीतते गए, लेकिन माया सारा को भूल नहीं पाई। वह सारा के व्यवहार और उससे मिले दुख को अपने मन में दबाए रखती थी। वह बार-बार वही पुरानी बातें सोचती रहती। इस वजह से माया की आँखों की चमक कम होने लगी और उसकी मुस्कुराहट गायब हो गई। जो व्यक्ति उसे छोड़कर चला गया था, उसे अपने दिल में बसाए रखने के कारण माया अपनी आंतरिक सुंदरता और शांति खोती जा रही थी।
एक दिन गाँव की एक बुजुर्ग महिला ने माया को उदास देखा और पास आकर कहा, "बेटी, जो तुम्हें साथ नहीं दे सका, उसे अपने दिल में जगह देकर तुम अपनी खुद की चमक और शांति को नष्ट कर रही हो। उसे जाने दो, तभी तुम फिर से खिल सकोगी।"
माया को अपनी गलती समझ में आ गई। उसने सारा की कड़वाहट को अपने मन से निकाल दिया। जैसे ही उसने उस बोझ को उतारा, उसका मन फिर से हल्का हो गया और उसकी पुरानी मुस्कान और चमक वापस आ गई।