एक सुंदर से गाँव में मीरा और आर्यन रहते थे। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। एक दिन, एक छोटी सी बहस के कारण आर्यन गुस्से में आकर कुछ दिनों के लिए गाँव छोड़कर चला गया।
मीरा का दिल आर्यन की याद में तड़प रहा था। उसकी सहेलियों ने कहा, 'मीरा, तुम ऐसे उदास क्यों बैठी हो? जाओ, आर्यन को मनाओ और उसे वापस ले आओ!' मीरा के मन में भी आर्यन के पास जाने की तीव्र इच्छा थी, लेकिन उसने खुद को रोका। उसने सोचा कि प्रेम का अर्थ अपना आत्मसम्मान खोना नहीं है। उसने अपनी गरिमा बनाए रखी और शांति से अपने काम में जुटी रही।
कुछ दिनों बाद, जब आर्यन को अपनी गलती का अहसास हुआ, वह वापस आया। उसे लगा था कि मीरा उसे देखकर रोएगी या गिड़गिड़ाएगी, लेकिन उसने मीरा को बहुत ही शांत और गरिमामय पाया। आर्यन यह देखकर दंग रह गया कि इतनी तड़प होने के बावजूद मीरा ने अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। उस दिन आर्यन को मीरा से केवल प्रेम ही नहीं, बल्कि उसके चरित्र के प्रति गहरा सम्मान भी हुआ।