विक्रम नाम का एक बुद्धिमान यात्री ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों से होकर गुजर रहा था। उसके रास्ते में एक घना जंगल पड़ता था। लोग कहते थे कि उस जंगल में डाकू रहते हैं जो यात्रियों का धन लूट लेते हैं।
विक्रम डरा नहीं और अपनी यात्रा जारी रखी। तभी सोमू नाम का एक व्यक्ति उसके पास आया और बोला, "श्रीमान, मुझे अकेले चलने में डर लग रहा है, क्या मैं आपके साथ चल सकता हूँ?" विक्रम को सोमू की आँखों में कुछ संदेह लगा, फिर भी उसने उसे साथ ले लिया।
असल में, सोमू एक चोर था। यात्रियों के साथ मिलकर चलना और उनके सोने पर उनका सामान चुराना उसका काम था। उस रात वे एक छोटी सी सराय में रुके। आधी रात को सोमू ने चुपके से विक्रम का थैला तलाशा, लेकिन उसमें एक पैसा भी नहीं था! सोमू उलझन में पड़ गया कि इतना पैसा कहाँ गया।
अगले दिन वे एक नदी के किनारे रुके। सोमू ने फिर से थैले को टटोलने की कोशिश की, पर फिर भी कुछ नहीं मिला। दोपहर में जब वे एक फलों की दुकान पर रुके, तो विक्रम ने अपने थैले से सोने के सिक्के निकालकर फल खरीदे। यह देखकर सोमू दंग रह गया।
विक्रम मुस्कुराया और बोला, "क्या हुआ सोमू, तुम परेशान दिख रहे हो?"
सोमू ने झिझकते हुए पूछा, "साहब, आपके थैले में तो पैसे नहीं थे, फिर आपने फल कैसे खरीदे?"
विक्रम ने शांति से जवाब दिया, "जब तुम चोरी करने की कोशिश करते हो, तो मैं चुपके से पैसे निकालकर अपने दूसरे गुप्त थैले में रख देता हूँ। जब तुम थैला खाली देखकर सो जाते हो, तो मैं पैसे वापस मुख्य थैले में डाल देता हूँ। मैं चाहता था कि तुम्हें लगे कि तुमने मुझे नहीं पकड़ा।"
अपनी चोरी पकड़ी जाने पर सोमू शर्मिंदा होकर वहाँ से भाग गया।
Moral
चोर चाहे कितना भी चालाक क्यों न हो, बुद्धिमान व्यक्ति उसे मात दे ही देता है।