प्राचीन विजयनगर साम्राज्य में, तेनाली रामा अपने परिवार के साथ बहुत गरीबी में रहते थे। उनके लिए अपने पत्नी और पुत्र के लिए एक समय का भोजन जुटाना भी बहुत कठिन था। गरीबी के कारण वे अक्सर दुखी रहते थे।
एक दिन, अपनी मुश्किलों से छुटकारा पाने के लिए वे एक मंदिर में प्रार्थना करने गए। उनकी सच्ची भक्ति देखकर एक देवी उनके सामने प्रकट हुईं। देवी ने कहा, 'तेनाली, मैं तुम्हारी प्रार्थना से प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें एक वरदान देना चाहती हूँ।'
तभी उनके सामने दो सुनहरे पात्र प्रकट हुए। एक पात्र में नीले रंग का अमृत था और दूसरे में सुनहरे रंग का अमृत था। देवी ने समझाया, 'इस नीले अमृत को पीकर तुम संसार के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति बन जाओगे। इस सुनहरे अमृत को पीकर तुम जीवन भर धनवान रहोगे। लेकिन याद रहे, तुम्हें केवल एक ही पात्र चुनना है। दोनों को एक साथ नहीं पीना है।'
तेनाली रामा ने कुछ देर सोचा। उनके दिमाग में एक तरकीब सूझी। उन्होंने बिना देर किए, दोनों पात्रों के अमृत को आपस में मिला दिया और एक ही बार में पी लिया!
यह देखकर देवी क्रोधित हो गईं। उन्होंने पूछा, 'तेनाली! मैंने तुम्हें चुनने के लिए कहा था, तुमने दोनों को एक साथ क्यों पी लिया?'
तेनाली रामा ने बहुत ही विनम्रता और चतुराई से उत्तर दिया, 'हे देवी, यदि मेरे पास बुद्धि है लेकिन धन नहीं, तो मैं अपने परिवार की रक्षा कैसे करूँगा? और यदि मेरे पास धन है लेकिन बुद्धि नहीं, तो मैं उस धन को कैसे संभालूँगा? जीवन को सही ढंग से जीने के लिए मुझे बुद्धि और धन दोनों की आवश्यकता है।'
तेनाली रामा की इस बुद्धिमानी और तर्क को देखकर देवी बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, 'तुम्हारी बुद्धि ही तुम्हारा सबसे बड़ा वरदान है। ठीक है, मैं तुम्हें दोनों वरदान देती हूँ।'
इसके बाद, तेनाली रामा का जीवन पूरी तरह बदल गया। वे बहुत बुद्धिमान और समृद्ध हो गए। वे राजा कृष्णदेवराय के दरबार में एक अत्यंत सम्मानित और चतुर सलाहकार के रूप में जाने जाने लगे।
Moral
बुद्धि और समृद्धि का मेल ही जीवन को सफल बनाता है।