विजयनगर साम्राज्य में एक सुबह राजा कृष्णदेवराय बहुत चिड़चिड़े महसूस कर रहे थे। जब वे सुबह सोकर उठे, तो उन्होंने देखा कि एक सेवक उनके ठीक सामने खड़ा था। राजा को लगा कि उस सेवक का चेहरा देखना एक अपशकुन है। उन्होंने कुछ कहा नहीं, लेकिन मन ही मन उसे बुरा मान लिया।
उस दिन राजा के साथ कुछ भी ठीक नहीं हुआ। महत्वपूर्ण बैठकें टल गईं और काम में बाधाएँ आईं। राजा को लगा, 'आज का दिन इसलिए खराब है क्योंकि मैंने सुबह उस सेवक का चेहरा देखा था!'
तभी, कक्ष की ओर जल्दी से जाते समय, राजा का पैर एक भारी लकड़ी की कुर्सी से ज़ोर से टकरा गया। दर्द के मारे राजा गुस्से से लाल हो गए। उन्होंने चिल्लाकर कहा, 'यह सब उस सेवक की वजह से हुआ है! वह हमारे राज्य के लिए अशुभ है। सिपाहियों, उसे अभी बंदी बना लो और कड़ी सजा दो!'
पास ही खड़े तेनाली राम यह सब देखकर धीरे से मुस्कुराने लगे। क्रोधित होकर राजा ने पूछा, 'तेनाली राम! तुम क्यों हंस रहे हो?'
तेनाली राम ने शांति से उत्तर दिया, 'महाराज, मैं आपकी पीड़ा पर नहीं, बल्कि आपके तर्क पर हंस रहा हूँ। सुबह उस सेवक का चेहरा देखने से आपके पैर में बस एक छोटी सी चोट आई। लेकिन अब उसका चेहरा देखते ही आप उसकी जान लेने पर उतारू हो गए। तो बताइए महाराज, अपशकुन उस सेवक का चेहरा है या आपका यह अचानक आया क्रोध?'
राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने समझा कि कैसे क्रोध में उन्होंने एक निर्दोष को दोषी ठहराना चाहा। राजा ने अपनी भूल स्वीकार की और सेवक को सजा देने के बजाय उसे स्वर्ण मुद्राएं भेंट कीं।
Moral
क्रोध में लिया गया निर्णय हमेशा गलत होता है।