एक घने जंगल के बीचों-बीच एक बहुत ही सुंदर झील थी, जहाँ हंसों का एक बड़ा झुंड रहता था। उन हंसों का राजा बहुत ही समझदार और शांत स्वभाव का था। पास ही एक उल्लू रहता था, जो हंस राजा का बहुत सम्मान करता था। धीरे-धीरे, हंस राजा और उल्लू के बीच एक गहरी दोस्ती हो गई।
हंस राजा अक्सर अपने राज्य की खुशहाली के बारे में बातें करता था, लेकिन उल्लू हमेशा विनम्र रहता था और अपनी खूबियों के बारे में कभी कुछ नहीं कहता था। उल्लू को लगता था कि उसकी आवाज़ में बहुत दम है, पर उसे यह नहीं पता था कि उस दम का सही इस्तेमाल कैसे करना है।
एक दिन, जंगल के पास एक बड़ी सेना ने डेरा डाला हुआ था। सैनिक युद्ध की तैयारी कर रहे थे। तभी, एक उल्लू वहां से उड़ रहा था और अचानक उसने एक ज़ोरदार आवाज़ निकाली। उस आवाज़ को सुनकर सैनिकों ने सोचा, 'यह तो अपशकुन है! आज का सफर टाल देना ही ठीक होगा।'
दूर से यह सब देख रहे उल्लू को बहुत गर्व महसूस हुआ। उसने सोचा, 'अरे वाह! मेरी आवाज़ में इतनी शक्ति है कि मैं पूरी सेना को रोक सकता हूँ! मैं अब सिर्फ एक साधारण उल्लू नहीं, बल्कि एक सेना का सेनापति हूँ!'
अगले दिन जब सैनिक फिर से निकलने वाले थे, उल्लू ने फिर से ज़ोर से चिल्लाया। सैनिकों ने फिर से यात्रा रोक दी। अब उल्लू अपने इस 'उपलब्ध' को अपने दोस्त हंस राजा को दिखाना चाहता था। वह उड़कर हंस राजा के पास गया और बड़े गर्व से बोला, 'महाराज! अब मैं एक महान सेना का स्वामी बन गया हूँ। मेरी एक आवाज़ पूरे दल को रोक सकती है!'
हंस राजा को आश्चर्य हुआ, लेकिन उसे कुछ अजीब लगा। उसने कहा, 'अच्छा! अगर ऐसा है, तो चलो चलकर देखते हैं।'
हंस राजा उल्लू को सैनिकों के शिविर के पास ले गया। वहां पहुँचकर उल्लू ने अपनी शक्ति दिखाने के लिए फिर से ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। लेकिन सैनिक मूर्ख नहीं थे। एक सैनिक ने पहचान लिया कि यह पक्षी उन्हें डराकर भटकाने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले कि उल्लू दोबारा चिल्ला पाता, सैनिक ने अपना भाला उसकी ओर फेंक दिया। अपने घमंड में चूर उल्लू को समय रहते खतरे का अहसास नहीं हुआ और वह मारा गया।
हंस राजा यह देखकर बहुत दुखी हुआ कि कैसे एक छोटी सी बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताने के लालच ने उसके दोस्त की जान ले ली।
Moral
अहंकार और झूठा गर्व विनाश का कारण बनता है।