एक विशाल जंगल में एक शक्तिशाली शेर राजा रहता था। वह शेर बहुत ही धार्मिक स्वभाव का था और दैवीय नियमों में गहरा विश्वास रखता था। एक दिन, भूख से व्याकुल होकर शेर शिकार की तलाश में था, तभी उसकी नज़र घास चरती हुई एक ज़ेब्रा पर पड़ी। शेर ने तेज़ी से झपट्टा मारकर ज़ेब्रा को पकड़ लिया।
घबराए हुए ज़ेब्रा ने एक चालाकी सोची। उसने कहा, "महाराज! कृपया मुझे छोड़ दीजिए। मेरे शरीर पर ये काली धारियाँ ईश्वर का आशीर्वाद हैं। इन पवित्र निशानों वाले जीवों को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए, यह नियम है।" शेर ने इस बात पर विश्वास कर लिया और ज़ेब्रा को जाने दिया।
जल्द ही यह बात पूरे जंगल में फैल गई। ज़ेब्रा अब शेर से डरना बंद कर चुके थे। वे शेर के सामने ही नाचते और उसे परेशान करते थे। शेर को लगा कि उसकी शक्ति और सम्मान कम हो रहा है। तब शेर ने एक योजना बनाई और पड़ोसी जंगल से बाघों को मदद के लिए बुलाया।
जैसे ही बाघ आए, उन्होंने ज़ेब्रा का शिकार करना शुरू कर दिया। जब एक बाघ ने एक ज़ेब्रा को पकड़ा, तो ज़ेब्रा चिल्लाया, "रुक जाओ! मेरी इन पवित्र धारियों को देखो!"
बाघ जोर से हँसा और बोला, "मूर्ख! मेरे शरीर के इन धब्बों को देख। क्या ये भी ईश्वर ने दिए हैं? ये निशान मुझे शिकार करने की शक्ति देते हैं। शेर राजा ने तुम्हें बचाने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारी सच्चाई दिखाने के लिए हमें बुलाया है!"
ज़ेब्रा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने सीखा कि झूठ बोलकर एक बार तो बचा जा सकता है, लेकिन वह सुरक्षा स्थायी नहीं होती।
Moral
झूठ से मिली जीत अस्थायी होती है, सच्चाई ही असली सुरक्षा है।