एक घने जंगल में चतुर नाम की एक लोमड़ी रहती थी। एक दिन लोमड़ी को बहुत तेज़ भूख लगी। जंगल के फल और छोटे कीड़े उसकी भूख मिटाने के लिए काफी नहीं थे। भूख से व्याकुल होकर वह भोजन की तलाश में गाँव की सीमा पर पहुँच गई।
वहाँ एक चरवाहा अपनी भेड़ों के झुंड की रखवाली कर रहा था। भेड़ें बहुत स्वस्थ और तंदुरुस्त दिख रही थीं। लोमड़ी ने सोचा, 'अगर मैं एक भेड़ पकड़ लूँ, तो मेरा पेट भर जाएगा।' वह दबे पाँव झाड़ियों के पीछे छिपकर भेड़ पर हमला करने की योजना बनाने लगी। लेकिन चरवाहा बहुत सतर्क था। झाड़ियों में हलचल देख उसने अपनी लाठी ज़ोर से ज़मीन पर पटकी और चिल्लाया। लोमड़ी डरकर वहाँ से भाग गई।
कुछ देर बाद, लोमड़ी चरवाहे की झोपड़ी के पास पहुँची। उसने देखा कि चरवाहा भेड़ों को सुरक्षित बाड़े में बंद करके अपने घर जा रहा है। लोमड़ी ने मन ही मन सोचा, 'यह चरवाहा कितना दयालु है! यह अपनी भेड़ों का कितना ख्याल रखता है।'
लेकिन लोमड़ी की यह सोच जल्द ही डर में बदल गई। थोड़ी देर बाद, चरवाहा एक बड़ा चाकू लेकर बाहर आया। लोमड़ी ने देखा कि वह एक भेड़ को काटने की तैयारी कर रहा है। तब लोमड़ी को एक कड़वा सच समझ आया: चरवाहा भेड़ों की रक्षा प्यार से नहीं, बल्कि लालच में कर रहा था ताकि उन्हें बड़ा करके मांस के रूप में बेच सके!
लोमड़ी बुरी तरह डर गई। उसे समझ आ गया कि जो चीज़ प्यार जैसी दिखती है, वह केवल एक व्यापार हो सकता है। वह तुरंत वहाँ से भाग निकली और फिर कभी इंसानों की दया पर भरोसा न करने का फैसला किया।
Moral
दिखावे की दयालुता पर आँख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए।