एक घने जंगल के बीचों-बीच एक सुंदर तालाब था। उस तालाब में बहुत सारे मेंढक खुशी-खुशी रहते थे। उन मेंढकों का एक राजा था, लेकिन वह बहुत ही स्वार्थी था। उसे केवल अपने परिवार की सुख-सुविधाओं की चिंता थी। तालाब के अन्य मेंढकों की सुरक्षा या उनकी भूख से उसे कोई मतलब नहीं था।
उसी तालाब के किनारे एक बूढ़ा सांप रहता था। उम्र बढ़ने के कारण अब वह शिकार करने में असमर्थ था और भूख से व्याकुल रहता था। एक दिन सांप ने मेंढक राजा को देखा। राजा को केवल अपने परिवार के ऐशो-आराम में डूबा देख सांप के दिमाग में एक योजना आई।
सांप राजा के पास गया और बोला, "महाराज, मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ और अब तेज़ नहीं चल सकता। लेकिन यदि आप और आपका परिवार मेरी पीठ पर सवारी करें, तो मैं आपका वाहन बनूँगा और आपको जहाँ चाहें वहाँ ले जाऊँगा।"
राजा को लगा कि यह तो बहुत अच्छा अवसर है। उसने सोचा, "कुछ मेंढकों के जाने से क्या फर्क पड़ेगा? यह सांप मेरा काम आसान कर देगा।" उसने तुरंत हाँ कर दी।
हर दिन राजा और उसका परिवार सांप की पीठ पर सवारी करते थे। लेकिन जल्द ही सांप ने एक शर्त रखी। "महाराज, यात्रा करते समय मुझे बहुत भूख लगती है। क्या मैं आपके राज्य से दो मेंढक भोजन के रूप में ले सकता हूँ?"
अपने प्रजा की परवाह न करने वाले राजा ने लापरवाही से कहा, "हाँ, बिल्कुल! जब तक मेरा परिवार सुरक्षित है, दो मेंढकों से क्या फर्क पड़ता है?"
दिन बीतते गए और सांप रोज़ दो मेंढकों को खाकर अपना पेट भरने लगा। राजा केवल अपनी सवारी का आनंद लेता रहा और यह भूल गया कि तालाब के मेंढक धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। अंत में, तालाब में केवल राजा का परिवार ही बचा।
एक दिन सांप राजा के पास आया और बोला, "महाराज, आज मेरा बहुत बड़ा दावत का दिन है!" सांप ने सबसे पहले राजा के परिवार के छोटे मेंढकों को खाना शुरू कर दिया। डर के मारे राजा चिल्लाया, "कृपया हमें छोड़ दो! मैं तुम्हें और भोजन दूँगा!"
सांप जोर से हँसा और बोला, "तुमने अपने ही लोगों को अपने सुख के लिए मुझे सौंप दिया, अब मैं तुम्हें क्यों बचाऊँ?" और उसने राजा को भी खा लिया।
एक राजा जो अपनी प्रजा की रक्षा नहीं कर सकता, वह अंत में खुद को भी नहीं बचा सकता।
Moral
जो शासक अपनी प्रजा की रक्षा नहीं करता, उसका अंत भी बुरा ही होता है।