बहुत समय पहले एक समृद्ध राज्य में रोहन नाम का एक युवक रहता था। उसके पिता एक बहुत बड़े व्यापारी थे, लेकिन रोहन की एक बुरी आदत थी: उसे पैसे बचाने से ज़्यादा उन्हें खर्च करने में मज़ा आता था। उसका मानना था कि जब तक आज हम खुश हैं, कल की चिंता करने की क्या ज़रूरत है?
अपने पिता की मृत्यु के बाद, रोहन ने अपनी सारी संपत्ति ऐशो-आराम और फिजूलखर्ची में उड़ा दी। देखते ही देखते वह गरीब हो गया और एक छोटी सी झोपड़ी में रहने लगा। उसके पास केवल एक मोटा और गर्म कंबल बचा था।
एक सुबह, रोहन ने खिड़की से बाहर देखा। उसने देखा कि कुछ पक्षी एक पेड़ की टहनी पर एक साथ बैठे हैं। उसने मुस्कुराते हुए सोचा, 'देखो, पक्षी भी अब साथ बैठने लगे हैं! इसका मतलब है कि गर्मी का मौसम आने वाला है। अब मुझे इस भारी कंबल की ज़रूरत नहीं है।'
अपनी मूर्खता में, उसने उस कंबल को बाज़ार में बेच दिया और उससे मिले पैसों से ढेर सारी मिठाइयाँ खरीद लीं। उसे लगा कि वह बहुत चालाक है।
लेकिन प्रकृति ने उसके लिए कुछ और ही योजना बनाई थी। गर्मी आने के बजाय, अचानक बर्फीली हवाएँ चलने लगीं। आसमान काला पड़ गया और चारों तरफ कड़ाके की ठंड पड़ने लगी। बिना कंबल के, रोहन ठंड से बुरी तरह कांपने लगा। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह ठंड के कारण बीमार पड़ गया और पछताते हुए अपनी लापरवाही पर रोने लगा।
Moral
भविष्य की योजना बनाए बिना केवल वर्तमान के सुखों में खोए रहना हानिकारक है।