एक घने जंगल में कपी नाम का एक बंदर रहता था। कपी बहुत फुर्तीला था, लेकिन उसमें एक बहुत बुरी आदत थी: वह बहुत स्वार्थी था। जंगल के अन्य जानवर जब भी भोजन इकट्ठा करते, कपी उसे चुराकर खा जाता था। एक बार उसने एक नन्हे खरगोश की गाजरें चुरा लीं, और जब खरगोश रोने लगा, तो कपी बस हंसकर भाग गया। उसने लोमड़ी का खाना भी चुराया था।
एक दिन, कपी को जंगल के बीचों-बीच एक अद्भुत पेड़ दिखा। उस पेड़ पर चमकते हुए लाल सेब लगे थे। कपी ने लालच में आकर सेब तोड़ना शुरू कर दिया। तभी पेड़ पर बैठे एक समझदार उल्लू ने कहा, "रुको कपी! ये साधारण सेब नहीं हैं। ये केवल उन्हीं को सुख देते हैं जो दूसरों के साथ मिल-बाँटकर खाना जानते हैं।"
कपी ने उसकी बात अनसुनी कर दी और बोला, "मुझे दूसरों की चिंता नहीं, मुझे भूख लगी है!" उसने एक बड़ा सेब काट लिया। कुछ ही देर में कपी के पेट में तेज़ दर्द होने लगा। वह ज़मीन पर लोटने लगा और चिल्लाया, "ओह! मेरे पेट में बहुत दर्द हो रहा है! उल्लू दादा, अब मैं क्या करूँ?"
उल्लू ने शांति से कहा, "इसका उपाय सरल है। जो भी तुम्हारे पास है, उसे दूसरों के साथ बाँटना शुरू करो। तभी तुम्हारा दर्द ठीक होगा।"
कपी पहले तो थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन दर्द बर्दाश्त से बाहर था। उसने खरगोश और लोमड़ी के साथ अपना खाना बाँटना शुरू किया। यह देखकर जंगल के सभी जानवर हैरान रह गए! वे अब कपी से नाराज़ नहीं थे, बल्कि उसके दोस्त बन गए। वे कपी के लिए अच्छे फल लाने लगे।
कुछ समय बाद, कपी फिर से उसी सेब के पेड़ के पास गया। उसने एक सेब खाया। इस बार उसके पेट में दर्द नहीं हुआ, बल्कि उसे एक अनोखी शांति और खुशी महसूस हुई जो उसने पहले कभी नहीं जानी थी।