हरे-भरे पहाड़ों के बीच विक्रम और सोम नाम के दो राजकुमार रहते थे। विक्रम बहुत दयालु था, लेकिन उसका मित्र सोम एक बात को लेकर उलझन में था।
एक दिन सोम ने विक्रम से पूछा, "विक्रम, तुम भी सबकी मदद करते हो, फिर भी लोग कर्ण को इतना बड़ा दानी क्यों कहते हैं? लोग तुम्हारी तुलना में उसकी प्रशंसा अधिक क्यों करते हैं?"
यह सुनकर एक ज्ञानी महात्मा ने उन्हें एक सबक सिखाने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी शक्ति से चमकते नीलम से भरे दो सुंदर संदूक प्रकट किए।
महात्मा ने कहा, "सोम, इस पहले संदूक को लेकर गाँव जाओ। वहाँ लोगों की ज़रूरतें देखो और उन्हें ज़रूरत का सामान दे दो। काम पूरा होने पर वापस आना।"
सोम उत्साह के साथ गाँव गया। उसने लोगों को लाइन में खड़ा किया और ध्यान से देखा। एक बूढ़ी दादी को नए कपड़ों की ज़रूरत थी, एक बच्चे को पढ़ाई के लिए किताबों की, और एक किसान को औजारों की। सोम ने नीलम देकर उनकी मदद की। लोग खुशी से चिल्लाए, "धन्यवाद राजकुमार सोम! आप बहुत महान हैं!" सोम गर्व के साथ वापस आया।
महात्मा ने दूसरा संदूक दिया और कहा, "अब इस दूसरे संदूक को भी उसी गाँव में दे आओ।"
सोम फिर से गाँव गया। इस बार लोग उसे देखकर और भी उत्साहित हो गए। सोम ने उन्हें सामान तो दिया, लेकिन उसके मन में एक लालच आ गया था—वह लोगों की प्रशंसा सुनना चाहता था। वह चाहता था कि लोग कहें कि वह कितना महान है। वह देर तक वहीं रुका रहा ताकि लोग उसे और सराह सकें।
वापस आने पर महात्मा ने पूछा, "सोम, तुमने क्या सीखा?"
सोम ने कहा, "मैंने उनकी मदद की और उन्होंने मेरी प्रशंसा की।"
महात्मा मुस्कुराए और बोले, "यही गलती है। तुमने मदद तो की, लेकिन तुम प्रशंसा पाने का इंतज़ार कर रहे थे। सच्चा दानी कर्ण कभी प्रशंसा की इच्छा नहीं रखता। वह केवल दूसरों की सेवा करने पर ध्यान देता है। बिना किसी दिखावे या तारीफ की चाह के किया गया दान ही सच्चा दान है।"
Moral
प्रशंसा की इच्छा किए बिना किया गया दान ही सच्चा दान है।