सर्दियों की एक शाम, राजा विक्रम अपने महल के झरोखे में बैठे ठंडी हवा का आनंद ले रहे थे। अचानक तेज़ ठंड बढ़ने लगी। "उफ़! यह ठंड तो बर्दाश्त से बाहर है!" राजा ने कहा।
बीरबल मुस्कुराए और बोले, "महाराज, यह हवा तो कुछ भी नहीं है। अगर कोई उस बर्फीली नदी में उतरे, तो वह ठंड सहन नहीं कर पाएगा।"
राजा ने एक घोषणा की कि जो कोई भी उस बर्फीली नदी में लंबे समय तक खड़ा रहेगा, उसे सोने के सिक्कों का इनाम दिया जाएगा।
रवि नाम का एक गरीब लकड़हारा यह सुनकर आया। वह बर्फीले पानी में उतर गया। उसका शरीर कांप रहा था, लेकिन उसकी नज़रें दूर एक जलते हुए लालटेन पर टिकी थीं। वह काफी देर तक उस रोशनी को देखता रहा और अंत में पानी से बाहर आया।
राजा चकित रह गए। "रवि, तुमने इतनी ठंड में खुद को कैसे संभाला?"
रवि ने विनम्रता से कहा, "महाराज, मुझे ठंड से ज़्यादा अंधेरे और अकेलेपन से डर लगता था। उस लालटेन की रोशनी को देखते रहने से मैं ठंड को भूल गया।"
राजा को लगा कि उसने कोई बड़ी उपलब्धि नहीं की। उन्होंने कहा, "तुमने ठंड को नहीं जीता, बस अपना ध्यान भटका लिया। तुम्हें कोई इनाम नहीं मिलेगा।"
बीरबल ने राजा को सबक सिखाने का फैसला किया। उन्होंने राजा को रात के खाने पर अपने घर बुलाया।
जब खाना परोसा जाने वाला था, राजा ने भूख से व्याकुल होकर पूछा, "बीरबल, खाना कहाँ है? मुझे बहुत भूख लगी है!"
बीरबल ने शांति से उत्तर दिया, "महाराज, खाना तैयार हो रहा है। मैं बस उस दूर वाले दीपक की रोशनी में खाना बना रहा हूँ।"
राजा हैरान रह गए। "दीपक की रोशनी में खाना? यह कैसे संभव है?"
बीरबल बोले, "महाराज, यदि एक व्यक्ति केवल रोशनी को देखकर बर्फीले पानी में खड़ा रह सकता है, तो हम रोशनी में खाना क्यों नहीं बना सकते? रवि ने अपनी एकाग्रता से ठंड पर विजय पाई। उसकी इच्छाशक्ति ही उसकी असली जीत है।"
राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने तुरंत रवि को बुलाया और उसे सोने के सिक्कों से पुरस्कृत किया।
Moral
किसी के साहस को उसकी परिस्थिति समझे बिना कम न आंकें।