एक छोटे से गाँव में कवि नाम का एक मेहनती किसान रहता था। कवि बहुत ही ईमानदार व्यक्ति था। एक बार, कवि ने अपनी जमा पूँजी—सोने के सिक्कों से भरी एक छोटी लकड़ी की पेटी—अपने पुराने दोस्त माधव को संभालने के लिए दी। कवि ने कहा, "माधव, मैं कुछ दिनों के लिए तीर्थ यात्रा पर जा रहा हूँ, कृपया इस पेटी का ध्यान रखना।"
जब कवि वापस आया, तो माधव ने अपना व्यवहार बदल लिया। उसने झूठ बोलते हुए कहा, "कैसी पेटी? तुमने तो मुझे कुछ दिया ही नहीं!"
कवि बहुत दुखी हुआ। उसके पास कोई सबूत नहीं था, इसलिए वह गाँव के मुखिया के पास न्याय माँगने पहुँचा। मुखिया ने माधव को बुलाया। माधव ने बड़ी चतुराई से शपथ ली, "मैं कसम खाता हूँ कि मैंने ऐसी कोई पेटी नहीं देखी!"
मुखिया ने कवि से पूछा, "तुमने वह पेटी कहाँ रखी थी?"
कवि ने उत्तर दिया, "नदी के किनारे वाले उस पुराने बरगद के पेड़ के नीचे।"
मुखिया दोनों को उस बरगद के पेड़ के पास ले गए। पेड़ के सामने खड़े होकर मुखिया ज़ोर से बोले, "हे बरगद के पेड़! तुम साक्षी हो। कवि की पेटी अभी माधव को लौटा दो!"
कुछ देर तक सन्नाटा रहा। कवि निराश हो गया। तब मुखिया ने कवि से कहा, "कवि, उदास मत हो। पेड़ ने अपनी गवाही दे दी है। पेड़ ने पेटी माधव को सौंप दी है। अब माधव, तुम वह पेटी कवि को दे दो।"
कवि हैरान रह गया। मुखिया ने माधव की आँखों में देखते हुए पूछा, "माधव, अगर तुमने पेटी देखी ही नहीं, तो तुम्हें कैसे पता चला कि वह पेड़ नदी के किनारे वाले उसी खास स्थान पर है? तुमने पेटी को वहीं छिपाया था न?"
माधव डर गया और काँपने लगा। उसकी एक छोटी सी गलती ने उसे पकड़वा दिया। उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। मुखिया ने माधव को सजा दी और कवि को उसका धन वापस मिल गया।
Moral
झूठ के पैर नहीं होते, सच एक न एक दिन सामने आ ही जाता है।