पहाड़ों के बीच बसे एक शांत गाँव में सोमू नाम का एक फूलों का विक्रेता रहता था। सोमू बहुत ही ईमानदार व्यक्ति था। उसी गाँव में रवि नाम का एक किराना व्यापारी भी रहता था। रवि के मन में थोड़ा लालच था। जब भी सोमू अपना सारा सामान बेचकर घर लौटता, रवि चुपके से सोमू की थैली से कुछ सिक्के निकालकर अपनी थैली में डाल लेता था।
कुछ हफ्तों बाद, सोमू ने महसूस किया कि उसकी बचत उम्मीद से बहुत कम है। पहले उसे लगा कि शायद उससे गिनती में गलती हुई है, लेकिन जब यह बार-बार होने लगा, तो उसे शक हुआ। सोमू गाँव के बुद्धिमान मुखिया, माणिकम जी के पास न्याय के लिए गया।
माणिकम जी बहुत चतुर थे। उन्होंने सोमू और रवि दोनों को गाँव के चौक पर बुलाया। रवि ने बहुत मासूमियत से कहा, "मुखिया जी, मैंने तो सोमू की थैली को छुआ तक नहीं! शायद सोमू को गिनती में भूल हो रही है।"
माणिकम जी समझ गए कि रवि झूठ बोल रहा है। उन्होंने एक योजना बनाई। उन्होंने गाँव वालों से एक बड़े बर्तन में साफ पानी लाने को कहा। उन्होंने कहा, "अब, आप दोनों अपनी-अपनी थैलियों के सारे सिक्के इस पानी में डाल दें।"
दोनों ने ऐसा ही किया। जैसे ही सिक्के पानी में गिरे, पानी की सतह पर छोटी-छोटी नीली बूंदें तैरने लगीं। ये बूंदें सोमू के मोगरे के फूलों के इत्र की थीं। सोमू दिन भर फूलों के रस और इत्र के साथ काम करता था, इसलिए उसके सिक्कों पर उस खुशबू का हल्का असर था। लेकिन रवि के सिक्के बिल्कुल साफ थे।
माणिकम जी ने कहा, "रवि, तुम्हारी लालच ने ही तुम्हें पकड़वा दिया। इन नीली बूंदों ने सच बोल दिया है।"
रवि शर्मिंदा हो गया और उसने अपनी गलती मान ली। सोमू को उसके पैसे वापस मिल गए और रवि को अपनी गलती का अहसास हुआ।
Moral
सत्य को छिपाया नहीं जा सकता, वह देर-सबेर सामने आ ही जाता है।