हरे-भरे पहाड़ों के पास बसे एक छोटे से गाँव में एक पुरानी परंपरा थी। जब कोई लड़का बड़ा होता था, तो उसे अपनी हिम्मत साबित करने के लिए एक परीक्षा देनी होती थी। इस परीक्षा के बारे में किसी को भी बताना मना था।
कविन नाम का एक लड़का इस परीक्षा के लिए तैयार था। उसकी आँखों पर एक नरम कपड़ा बाँध दिया गया। उसके पिता उसे जंगल के बीचों-बीच एक पुराने पेड़ के नीचे बैठाकर गए। उन्होंने धीरे से कहा, "कविन, डरना मत। जब तक सुबह की पहली किरण तुम्हें न छुए, तुम यहीं रहना।"
जैसे-जैसे रात हुई, जंगल की आवाज़ें बदलने लगीं। पत्तों की सरसराहट, दूर कहीं लोमड़ी का रोना और अजीब सी पक्षियों की आवाज़ें सुनकर कविन घबरा गया। उसे लगा, 'क्या मैं इस घने जंगल में बिल्कुल अकेला हूँ? क्या कोई मेरा साथ देने वाला नहीं है?'
डर के बावजूद, उसने हिम्मत नहीं हारी और धैर्य के साथ एक ही जगह बैठा रहा। सुबह जब सूरज की सुनहरी रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी, तो उसने अपनी आँखों से पट्टी हटाई। उसने देखा कि पास ही एक बड़ी चट्टान पर उसके पिता बैठे थे। वे पूरी रात चुपचाप उसकी रक्षा कर रहे थे। कविन को समझ आया कि चाहे वह कितना भी अकेला क्यों न महसूस करे, उसका परिवार हमेशा उसके साथ रहता है।
Moral
जब हमें लगता है कि हम अकेले हैं, तब भी हमारा परिवार हमारा साथ दे रहा होता है।