एक छोटे से सुंदर गाँव में सोमू नाम के एक दादाजी रहते थे। उनके बहुत सारे पोते-पोतियां थे। जब भी छुट्टियाँ होतीं, सभी बच्चे दादाजी के घर आते और बहुत मस्ती करते थे। एक दिन, घर में उत्सव की तैयारी चल रही थी, तभी दादाजी बहुत परेशान दिखने लगे।
"अरे नहीं! मेरी सुनहरी डायरी कहाँ खो गई?" दादाजी घबराकर अपनी मेज टटोलने लगे। यह देखते ही सभी बच्चे मदद के लिए दौड़ पड़े। कमरे में शोर मच गया। कोई सोफे के नीचे देख रहा था, तो कोई अलमारी के डिब्बे उलट रहा था। "क्या यह कालीन के नीचे है?" "क्या तुमने दराज में देखा?" सब चिल्ला-चिल्लाकर एक-दूसरे से पूछ रहे थे।
पूरा कमरा अस्त-व्यस्त हो गया और शोर इतना बढ़ गया कि किसी को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। काफी देर तक ढूंढने के बाद, बच्चे थककर बैठ गए। "दादाजी, हमें कहीं नहीं मिली!" उन्होंने मायूसी से कहा।
तभी, कविन नाम के एक छोटे लड़के ने कुछ अलग करने का सोचा। उसने शोर मचाने के बजाय, कमरे के एक कोने में चुपचाप बैठ गया और अपनी आँखें बंद कर लीं। वह बिल्कुल शांत था। जहाँ बाकी बच्चे शोर मचा रहे थे, कविन वहाँ की आवाज़ों को ध्यान से सुनने की कोशिश कर रहा था।
अचानक, कविन की आँखें खुल गईं। वह धीरे से एक पुरानी लकड़ी की पेटी के पास गया। उसने देखा कि एक छोटे से कोने में वह सुनहरी डायरी दबी हुई थी। उसने उसे बड़े प्यार से निकाला और दादाजी को दे दिया।
"कविन! तुमने इसे कैसे ढूँढा? हम सब इतनी देर से ढूँढ रहे थे, पर हमें नहीं मिली!" बाकी बच्चों ने हैरानी से पूछा।
दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बच्चों, कविन ने आज एक बड़ी बात सिखाई है। जब तुम सब शोर मचा रहे थे, तो तुम्हें सिर्फ अपनी आवाज़ सुनाई दे रही थी। लेकिन कविन शांत था, इसलिए उसे उस डायरी के पास मौजूद छोटी घड़ी की 'टिक-टिक' सुनाई दे गई। शांति का मतलब सिर्फ चुप रहना नहीं है, बल्कि शांति हमें गहराई से सोचने और सुनने की शक्ति देती है।"
सभी बच्चों को समझ आ गया कि किसी भी समस्या का हल पाने के लिए शोर मचाने की नहीं, बल्कि शांत रहकर ध्यान लगाने की ज़रूरत होती है।