एक घने जंगल में करिकालन नाम का एक भेड़िया रहता था। वह बहुत शक्तिशाली शिकारी था और रोज़ जानवरों का शिकार करता था। उसे अपनी ताकत पर बहुत घमंड था।
एक दिन, एक जंगली सूअर के साथ लड़ाई में करिकालन बुरी तरह घायल हो गया। उसके पैर में गहरा घाव हो गया था, जिससे वह हिल भी नहीं पा रहा था। वह एक झाड़ी के पीछे दर्द से कराह रहा था।
कई दिन बीत गए। भूख और प्यास से करिकालन बहुत कमज़ोर हो गया था। तभी वहाँ से बकरियों का एक झुंड गुज़रा। करिकालन ने एक बकरी को देखकर चालाकी से कहा,
"प्यारी बकरी, मुझे बहुत प्यास लगी है। क्या तुम मुझे थोड़ा पानी दे सकती हो? पानी पीकर ही मैं फिर से खड़ा हो पाऊँगा," उसने बड़ी मासूमियत से कहा।
लेकिन वह बकरी बहुत समझदार थी। उसने भेड़िए की आँखों में झाँककर कहा, "भेड़िए, तुम आज मदद माँग रहे हो, लेकिन तुम्हारी आँखों में अभी भी शिकार करने की चमक है। अगर आज मैंने तुम्हारी मदद की, तो कल ठीक होने के बाद तुम हमें ही मार डालोगे। इसलिए मुझे माफ़ कर दो," और वह अपने झुंड के साथ वहाँ से भाग गई।
करिकालन हाथ मलता रह गया। बकरी की समझदारी ने उसकी जान बचा ली थी।
Moral
दुश्मन की मीठी बातों में नहीं आना चाहिए; बुद्धिमानी ही सबसे बड़ा बचाव है।