एक सुंदर नीली झील के किनारे बत्तखों का एक परिवार रहता था। उस परिवार में एक माँ बत्तख और उसके पाँच नन्हे बच्चे थे। बच्चे बहुत छोटे थे, इसलिए वे खुद भोजन की तलाश में गहरे पानी में नहीं जा सकते थे। माँ बत्तख ही रोज़ झील के किनारों से ताज़ा घास और छोटे कीड़े ढूँढकर लाती और अपने बच्चों को खिलाती थी।
बच्चे बड़े चाव से खाना खाते और फिर दिन भर झील के किनारे खेलते रहते। एक दिन, बत्तखों की दादी माँ उनसे मिलने आईं। नन्हे बच्चे खुशी से चहकने लगे और बोले, "दादी माँ! दादी माँ! इधर आइए!"
दादी माँ ने प्यार से पूछा, "बच्चों, तुम्हारी माँ कहाँ है? क्या वह तुम्हारे साथ नहीं है?"
बच्चों ने कहा, "दादी माँ, माँ खाना ढूँढने गई हैं। हमने तो अपना खाना खा लिया है।"
दादी माँ ने थोड़ा सोचकर पूछा, "अच्छा! क्या तुमने अपनी माँ को खाना खाते हुए देखा?"
बच्चे एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। तभी सबसे छोटे बच्चे ने धीरे से कहा, "ओह नहीं! माँ जो भी खाना लाती थीं, हम सब उसे चट कर जाते थे। हमने माँ के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा!"
दादी माँ ने उन्हें समझाते हुए कहा, "प्यारे बच्चों, तुम अभी छोटे हो, इसलिए गलती होना स्वाभाविक है। लेकिन याद रखो, तुम्हारी माँ तुम्हारे लिए कितनी मेहनत करती हैं। अब से, चाहे खाना कितना भी कम क्यों न हो, थोड़ा हिस्सा माँ के लिए बचाकर रखा करो। या फिर माँ के आने तक इंतज़ार किया करो। मिल-जुलकर खाने में ही असली खुशी है।"
बच्चों को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने वादा किया कि वे अब से माँ के लिए खाना बचाकर रखेंगे। उस दिन के बाद से, जब भी माँ खाना लेकर आतीं, बच्चे धैर्य से इंतज़ार करते और सबसे पहले माँ को खिलाते।
Moral
माता-पिता के परिश्रम का सम्मान करें और मिल-जुलकर रहने की आदत डालें।