एक घने जंगल के बीचों-बीच एक बहुत पुराना महल था। वहाँ ग्रोग नाम का एक विशालकाय जीव रहता था। एक बार, ग्रोग को किसी काम से बहुत दूर जाना पड़ा, इसलिए वह अपने महल को खाली छोड़कर चला गया।
जब ग्रोग वहाँ नहीं था, तो महल के चारों ओर का सुंदर बगीचा गाँव के बच्चों के खेलने का ठिकाना बन गया। बच्चे रोज़ वहाँ आते, खेलते और हँसते थे। बच्चों की खुशी और उनके शोर से बगीचे के फूल और भी खिल उठते थे और पेड़ और भी हरे-भरे हो जाते थे।
कुछ समय बाद जब ग्रोग वापस लौटा, तो उसने देखा कि बच्चे उसके आँगन में खेल रहे हैं। उसे बहुत गुस्सा आया और उसने चिल्लाकर कहा, 'यह मेरा घर है! अब से कोई भी यहाँ नहीं खेलेगा!'
बच्चों को डराने के लिए, ग्रोग ने बगीचे के रास्ते में बड़े-बड़े पत्थर और कांटेदार झाड़ियाँ डाल दीं। डर के मारे बच्चे रोते हुए वहाँ से भाग गए।
धीरे-धीरे बगीचा बदलने लगा। बच्चों की हंसी के बिना, वहाँ सन्नाटा छा गया। फूल मुरझाने लगे, पेड़ सूखने लगे और वह सुंदर बगीचा एक उजाड़ जगह बन गया। ग्रोग ने जब अपने महल के बाहर का सूखा बगीचा देखा, तो उसका मन उदास हो गया।
उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने सोचा, 'मैं कितना स्वार्थी था! मैंने अपने घर को बचाने के चक्कर में इसकी सुंदरता ही खत्म कर दी। बच्चों के बिना यह जगह कितनी बेजान है!'
ग्रोग ने तुरंत उन भारी पत्थरों को हटाना शुरू किया और काँटों को साफ किया। उसने बगीचे के रास्ते फिर से सुंदर बना दिए। जब बच्चों ने देखा कि रास्ता साफ है, तो वे फिर से वहाँ खेलने आने लगे। बच्चों के आते ही बगीचा फिर से खिल उठा। ग्रोग समझ गया कि खुशियाँ बाँटने से ही जीवन में असली रौनक आती है।
Moral
स्वार्थ हमारी खुशी और सुंदरता को छीन लेता है।