एक सुंदर गाँव में सोमू नाम का एक किसान रहता था। उसके तीन बेटे थे। सबसे बड़ा बेटा कथिर बहुत बुद्धिमान था, लेकिन बहुत आलसी था। दूसरा बेटा विमल बहुत अच्छा था, पर बहुत डरपोक था। सबसे छोटा बेटा अरुण बहुत मेहनती और साहसी था।
एक दिन सोमू ने दुखी होकर अपने बेटों को बुलाया। "हमारे खेत की फसलें रात में कोई जानवर खा रहा है। हमें पता ही नहीं चल पा रहा कि वह कौन है," उसने कहा।
सबसे पहले कथिर खेत की रखवाली करने गया। लेकिन अंधेरे में किसी जानवर की आहट सुनते ही वह डरकर घर भाग आया। अगले दिन विमल गया, उसे भी डर लगा और वह भी भाग आया।
तब अरुण ने कहा, "पिताजी, मैं पता लगाऊंगा।"
उस रात अरुण खेत में गया। उसने देखा कि चाँदनी रात में एक सुंदर सफेद घोड़ा फसलें खा रहा है। अरुण डरा नहीं, बल्कि उसने धीरे से घोड़े के पास जाकर उसे एक सेब खिलाया। घोड़े ने खुश होकर अरुण को एक पीतल की ढाल भेंट की। अगले दिन अरुण ने उसे अनाज खिलाया, तो घोड़े ने चांदी की ढाल दी। तीसरे दिन अरुण ने उसे भरपेट खाना खिलाया, तो घोड़े ने उसे सोने की ढाल दी।
कुछ दिनों बाद, राजा ने घोषणा की, "हमारी राजकुमारी फिसलन भरी चट्टानों वाली घाटी में फंस गई है। जो भी उसे सुरक्षित वापस लाएगा, उसे बड़ा इनाम मिलेगा!"
कथिर ने कोशिश की, लेकिन फिसलकर गिर गया। विमल ने कोशिश की, पर डर के मारे वापस आ गया।
अरुण ने अपने जादुई घोड़े पर सवार होकर कोशिश की। पहले उसने पीतल की ढाल पहनी, पर वह फिर फिसल गया। फिर उसने चांदी की ढाल पहनी, पर फिर असफल रहा। लेकिन अरुण ने हार नहीं मानी। उसने सोने की ढाल पहनी और पूरी हिम्मत के साथ फिर से चढ़ना शुरू किया। वह बार-बार फिसला, पर उसने हिम्मत नहीं हारी। अंत में, वह राजकुमारी को बचाकर महल ले आया।
राजा ने अरुण को बहुत सम्मान और पुरस्कार दिया। उसके भाइयों को समझ आया कि अरुण की सफलता का राज केवल ढाल नहीं, बल्कि उसका कभी हार न मानने वाला जज्बा था।