एक समय की बात है, एक गाँव में रवि नाम का एक चोर रहता था। वह कोई काम नहीं करता था और चोरी करके अपना पेट पालता था। जब गाँव में चोरियाँ बढ़ गईं, तो राजा ने एक बुद्धिमान सेनापति को वहाँ भेजा। सेनापति ने गाँव में कड़ी सुरक्षा लगा दी, जिससे रवि के लिए चोरी करना मुश्किल हो गया। डर के मारे रवि ने सोचा कि क्यों न एक आखिरी बड़ी चोरी की जाए और गाँव छोड़ दिया जाए।
रवि ने मंदिर के कीमती गहने और बर्तन चुरा लिए। पकड़े जाने के डर से उसने अपने चेहरे पर नकली दाढ़ी और मूँछें चिपका लीं और एक साधु का रूप धारण कर लिया। थककर वह एक बड़े बरगद के पेड़ के नीचे सो गया। सुबह जब गाँव वालों ने उसे देखा, तो उन्हें लगा कि वह कोई महान साधु हैं। रवि ने सोचा, 'चोरी करने से तो अच्छा है कि साधु बनकर ही रहा जाए!' उसने साधु का भेष बनाए रखा और लोगों से उपहार और भोजन लेने लगा।
इधर, सेनापति चोर की तलाश कर रहा था। उसे पता चला कि पास के गाँव में एक नया साधु आया है जिसकी बहुत चर्चा है। सेनापति समझ गया कि यह वही चोर हो सकता है। उसने सोचा कि अगर वह सीधे साधु को पकड़ेगा, तो गाँव वाले नाराज हो सकते हैं। इसलिए उसने एक योजना बनाई।
सेनापति एक भक्त बनकर भीड़ में शामिल हुआ और जोर से बोला, 'हे महात्मा! पिछली बार आपने मेरी खोई हुई सोने की कटोरी चमत्कार से वापस दिलाई थी, उसके लिए मैं आपका धन्यवाद करने आया हूँ!' लोग हैरान रह गए। तभी एक दूसरा सैनिक, जो भक्त बना था, बोला, 'महाराज, हमारे मंदिर का सोने का दीपक चोरी हो गया है, कृपया उसे वापस दिला दें!'
रवि घबरा गया। उसने सोचा कि अगर उसने वह दीपक नहीं दिखाया, तो लोग उसे ढोंगी समझ लेंगे। डर के मारे वह अपनी कुटिया में गया और चोरी किया हुआ दीपक लेकर बाहर आया। उसने नाटक किया कि उसने मंत्र पढ़कर दीपक वापस पाया है।
लोग खुश होने लगे, लेकिन सेनापति के सैनिक ने पहचान लिया कि यह वही चोरी हुआ दीपक है। सेनापति आगे बढ़ा और रवि की नकली दाढ़ी खींच दी। दाढ़ी हाथ में आते ही सबका पर्दाफाश हो गया। रवि चोर निकल आया! सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। सेनापति ने गाँव वालों से कहा, 'किसी के बाहरी रूप को देखकर उस पर आँख मूँदकर विश्वास न करें।' गाँव वाले अपनी गलती पर शर्मिंदा हुए।
Moral
दिखावे पर न जाएँ, सच्चाई कभी न कभी सामने आ ही जाती है।