एक बड़े शहर में एक बहुत सुंदर कला संग्रहालय था। वहाँ एक बहुत ही अनोखा कमरा था, जिसे 'अनंत कक्ष' कहा जाता था। उस कमरे की दीवारें, फर्श और छत, सब कुछ चमकदार शीशों से बना था। उस कमरे में कदम रखते ही ऐसा लगता था जैसे आप खुद के अनगिनत रूपों से घिर गए हों।
एक शाम, संग्रहालय के गार्ड ने गलती से एक छोटा दरवाज़ा खुला छोड़ दिया। उसी दरवाज़े से एक आवारा कुत्ता, जो खाने की तलाश में था, चुपके से अंदर आ गया।
जैसे ही कुत्ता उस शीशे वाले कमरे में पहुँचा, वह सहम गया। उसे हर तरफ अपने जैसे दिखने वाले कई कुत्ते नज़र आए। डर के मारे उसे लगा कि ये सब कुत्ते उसे मारने आए हैं। अपनी रक्षा करने के लिए, वह ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा और उन 'अजनबियों' पर हमला करने के लिए झपटा।
जब भी वह शीशे से टकराता, उसे बहुत तेज़ दर्द होता। लेकिन डर और भ्रम के कारण वह रुक नहीं पाया। वह बार-बार उन ठंडी और सख्त दीवारों से टकराता रहा, और अंत में चोट और थकान के कारण उसकी जान निकल गई।
अगली सुबह जब कर्मचारी वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने यह दुखद दृश्य देखा। उन्हें समझ आया कि कुत्ते ने किसी बाहरी दुश्मन से लड़ाई नहीं की थी, बल्कि अपनी ही परछाईं को दुश्मन समझकर खुद को ही नुकसान पहुँचा लिया था।
Moral
बिना सोचे-समझे किया गया क्रोध और डर अक्सर हमारा ही नुकसान करता है।