अर्जुन एक बहुत ही तेज़ दौड़ने वाला लड़का था। उसकी रफ्तार देखकर सब दंग रह जाते थे, लेकिन स्कूल की बड़ी प्रतियोगिताओं में उसे कभी मौका नहीं मिलता था। कोच हमेशा दूसरे बच्चों को ही चुनते थे। अर्जुन बस किनारे खड़ा होकर दूसरों को दौड़ते देखता रहता था।
अर्जुन के पिता देख नहीं सकते थे, लेकिन वे अर्जुन की हर प्रैक्टिस देखने ज़रूर आते थे। वे ट्रैक के किनारे एक बेंच पर बैठते और अर्जुन के पैरों की आवाज़ सुनते। अर्जुन जब भी उनके पास जाता, वे मुस्कुराकर कहते, 'बेटा, तुम्हारी कदमों की आहट में आज एक नई ताकत सुनाई दे रही है।' उनके ये शब्द अर्जुन का हौसला बढ़ाते थे।
अचानक एक दिन अर्जुन के पिता का निधन हो गया। अर्जुन पूरी तरह टूट गया। कुछ दिनों बाद जब वह स्कूल लौटा, तो उस दिन राज्य स्तरीय दौड़ प्रतियोगिता थी। कोच ने अर्जुन की उदासी देखकर कहा, 'अर्जुन, तुम ठीक नहीं लग रहे हो, आज दौड़ने की ज़रूरत नहीं है।'
पर अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और कहा, 'सर, कृपया मुझे आज दौड़ने दें। मुझे इसकी ज़रूरत है।' कोच मान गए।
जैसे ही दौड़ शुरू हुई, अर्जुन बिजली की तरह दौड़ा। उसने सबको पीछे छोड़ दिया और सबसे पहले फिनिश लाइन पार की। पूरा मैदान तालियों से गूँज उठा।
उसके दोस्त दौड़कर आए और बोले, 'अर्जुन! आज तुम इतना तेज़ कैसे दौड़े? यह क्या जादू था?'
अर्जुन की आँखों में आँसू थे। उसने कहा, 'मेरे पिता देख नहीं सकते थे, लेकिन वे मेरी दौड़ की आवाज़ सुनने आते थे। आज वे मेरे साथ नहीं हैं, लेकिन मैं चाहता था कि मेरी जीत की आवाज़ इतनी तेज़ हो कि वे स्वर्ग से भी उसे सुन सकें और खुश हो सकें। आज मैंने उनके लिए दौड़ लगाई थी।'
Moral
अपनों की इच्छाओं को पूरा करना ही सबसे बड़ी जीत है।