एक शांत गाँव में, कविन नाम का एक छोटा लड़का अपने माता-पिता के साथ रहता था। कविन को भुनी हुई मूंगफली बहुत पसंद थी। एक शाम, उसकी माँ एक छोटा सा मिट्टी का घड़ा लेकर आईं, जो मूंगफली से भरा हुआ था।
उसकी माँ ने प्यार से समझाया, "कविन, उतनी ही मूंगफली निकालना जितनी तुम्हें चाहिए। एक साथ बहुत ज़्यादा निकालने की कोशिश मत करना।"
कविन बहुत उत्साहित था। उसने घड़े के संकरे मुँह से अपना हाथ अंदर डाला। उसे बहुत सारी मूंगफली चाहिए थी, इसलिए उसने मुट्ठी भर-भर कर ढेर सारी मूंगफली पकड़ ली। लेकिन जब उसने हाथ बाहर खींचने की कोशिश की, तो मूंगफली की वजह से उसकी मुट्ठी बड़ी हो गई और हाथ घड़े के संकरे गले में फंस गया।
कविन घबरा गया और रोने लगा। वह हाथ निकालने के लिए ज़ोर लगाता रहा, पर हाथ नहीं निकला। उसकी माँ ने पास आकर कहा, "बेटा, तुम्हारी लालच ने तुम्हें फँसा लिया है। अगर तुम अपनी मुट्ठी खोलकर ज़्यादातर मूंगफली छोड़ दोगे, तो तुम्हारा हाथ आसानी से बाहर आ जाएगा। अपनी इच्छा को थोड़ा कम करो, तभी तुम मुक्त हो पाओगे।"
कविन को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने धीरे से अपनी मुट्ठी खोली और ज़्यादातर मूंगफली घड़े में ही छोड़ दी। अब उसकी मुट्ठी छोटी हो गई थी और उसका हाथ आसानी से बाहर निकल आया।
कविन ने सीखा कि ज़रूरत से ज़्यादा पाने की कोशिश में हम वह भी खो देते हैं जो हमारे पास है। अब वह खुशी-खुशी अपनी मूंगफली खाने लगा।
Moral
लालच मुसीबत पैदा करता है, संतोष ही सुख है।