एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन बहुत होशियार था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, उसकी आँखें हमेशा मोबाइल की स्क्रीन पर टिकी रहती थीं। न तो उसे बाहर खेलना पसंद था और न ही दोस्तों से बात करना।
यह देखकर अर्जुन के पिता बहुत परेशान रहने लगे। उन्होंने अर्जुन की आदत सुधारने के लिए उसके दादाजी से मदद माँगी। अगले दिन, पिता अर्जुन को दादाजी के बगीचे में ले गए।
"चलो अर्जुन, आज हम बगीचे में सैर करते हैं," दादाजी ने प्यार से कहा।
वे बगीचे के रास्ते पर धीरे-धीरे चल रहे थे कि तभी उन्हें एक छोटा सा खरपतवार (weed) दिखाई दिया। "अर्जुन, उस छोटे से पौधे को ज़मीन से उखाड़ कर देखो," दादाजी ने कहा।
अर्जुन हँसा और उसने बस एक झटके में उस छोटे पौधे को उखाड़ दिया। "यह तो बहुत आसान था दादाजी!" अर्जुन ने कहा।
वे थोड़ा और आगे बढ़े और एक मज़बूत छोटे पौधे के पास पहुँचे। उसकी जड़ें मिट्टी में बहुत गहराई तक धंसी हुई थीं। "अब इस पौधे को उखाड़ने की कोशिश करो," दादाजी ने कहा।
अर्जुन ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। वह ज़ोर-ज़ोर से खींचने लगा, उसका चेहरा लाल हो गया, लेकिन वह पौधा टस से मस नहीं हुआ। वह उसे चाहकर भी नहीं उखाड़ सका।
दादाजी उसके पास बैठे और बोले, "अर्जुन, वह छोटा पौधा तुम्हारी छोटी गलतियों की तरह है। उन्हें सुधारना आसान है। लेकिन मोबाइल देखने की तुम्हारी यह आदत इस पौधे की जड़ों की तरह तुम्हारे मन में गहरी होती जा रही है। अगर तुमने इसे अभी नहीं रोका, तो यह इतनी गहरी हो जाएगी कि बाद में इसे बदलना बहुत मुश्किल होगा।"
अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने मोबाइल का कम इस्तेमाल करने का फैसला किया।
Moral
गलतियाँ जब छोटी हों, तभी उन्हें सुधार लेना चाहिए।