एक छोटे से गाँव में सोमू नाम के एक बुजुर्ग रहते थे। उनका बेटा रवि शहर में एक ऊँचे पद पर कार्यरत था। रवि हर महीने सोमू के भोजन और दवाइयों के लिए एक निश्चित राशि भेजता था। सोमू बहुत ही सादगी और किफायत से अपना जीवन बिताते थे।
एक दिन, सोमू के एक पड़ोसी ने उन्हें उकसाया, "आपका बेटा अब बहुत बड़ा आदमी बन गया है, अगर आप थोड़ा और पैसा मांगेंगे तो वह ज़रूर देगा।" इस बात ने सोमू के मन में लालच पैदा कर दिया। उन्होंने सोचा कि यदि थोड़े और पैसे मिलें, तो वे घर आने वाले मेहमानों के लिए मिठाइयाँ और पकवान खरीद सकेंगे। उन्होंने सीधे रवि से कहने के बजाय पड़ोसी के माध्यम से संदेश भिजवाया कि मासिक खर्च बढ़ाने की ज़रूरत है।
जब रवि को यह बात पता चली, तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने अपने पिता को फोन किया और बहुत ही सम्मानपूर्वक लेकिन दृढ़ता से समझाया, "पिताजी, मैं आपकी सभी जरूरतों और स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए ही पैसे भेजता हूँ। मेहमानों के लिए मिठाई खरीदना एक अनावश्यक खर्च है। हमें दिखावे के बजाय आपकी सेहत पर ध्यान देना चाहिए। अभी जो राशि भेजी जा रही है, वह आपके लिए पर्याप्त है।"
रवि की समझदारी और ईमानदारी देखकर सोमू को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने समझा कि सादगी में ही असली शांति और संतोष है।
Moral
अनावश्यक दिखावे और विलासिता से बचना चाहिए; सादगी ही सुख की कुंजी है।