दस साल का कविन एक बहुत ही समझदार लड़का था। उसके पिता एक छोटी सी कार्यशाला चलाते थे और माँ एक पुस्तकालय में काम करती थीं। वे दोनों बहुत मेहनती थे, लेकिन काम की वजह से वे घर पर बहुत कम समय बिता पाते थे। जब भी कविन अपने दोस्तों को उनके माता-पिता के साथ खेलते देखता, तो उसे अकेलापन महसूस होता था।
एक शाम, कविन ने अपने पिता से पूछा, "पापा, आप महीने में कितना कमाते हैं?"
उसके पिता हैरान रह गए, "अचानक यह क्यों पूछ रहे हो, कविन?"
"मुझे बस कुछ हिसाब लगाना है," कविन ने धीरे से कहा।
जब माता-पिता ने अपनी मासिक आय बताई, तो कविन ने कागज पर हिसाब लगाया। "इसका मतलब है कि आप एक दिन में लगभग दो हजार रुपये कमाते हैं," उसने कहा।
फिर, कविन ने अपनी गुल्लक निकाली और उसमें से सारे पैसे निकालकर मेज पर रख दिए। वे पैसे पूरे दो हजार रुपये थे। कविन ने अपने माता-पिता की ओर देखते हुए कहा, "पापा, माँ, ये रहे दो हजार रुपये। कृपया इस पैसे से कल का पूरा दिन खरीद लीजिए। मैं चाहता हूँ कि कल आप काम पर न जाएं और पूरा दिन मेरे साथ खेलें और बातें करें।"
कविन की बात सुनकर माता-पिता की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें अहसास हुआ कि वे भविष्य बनाने के लिए काम तो कर रहे थे, लेकिन वर्तमान के अनमोल पल खो रहे थे। उन्होंने समझा कि पैसा सब कुछ नहीं है। उस दिन के बाद, उन्होंने काम के साथ-साथ परिवार के लिए समय निकालना शुरू कर दिया।
Moral
पैसा बहुत सी चीजें खरीद सकता है, लेकिन अपनों का समय नहीं।