एक सुंदर जंगल के किनारे खरगोशों का एक परिवार रहता था। उसी परिवार में चीकू नाम का एक छोटा खरगोश था। चीकू बहुत ही जिज्ञासु और चंचल था।
एक सुबह, खरगोश की माँ को पास के गाँव में कुछ काम से जाना था। जाने से पहले उन्होंने अपने बच्चों को समझाया, "मैं जब तक वापस न आ जाऊँ, तब तक तुम इस घास के मैदान में ही खेलना। उस बाड़ के पार वाले बगीचे में मत जाना, वहाँ का मालिक बहुत सख्त है और तुम मुसीबत में पड़ सकते हो।"
माँ के जाने के बाद, बाकी खरगोश मैदान में खेल रहे थे। लेकिन चीकू के मन में एक सवाल घूम रहा था। 'माँ उस बगीचे से इतना क्यों डरती हैं? वहाँ ऐसा क्या है?'
अपनी जिज्ञासा को रोक न पाने के कारण, चीकू धीरे से बाड़ के नीचे से निकलकर बगीचे में घुस गया। अंदर का नज़ारा देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं! वहाँ ताज़ा गाजरें और हरी सब्जियाँ लहलहा रही थीं। चीकू ने तुरंत एक गाजर खाना शुरू कर दिया।
तभी अचानक, 'धप! धप! धप!' की आवाज़ आई। बगीचे का मालिक हाथ में डंडा लिए आ रहा था। चीकू को देखते ही वह चिल्लाया, "ओए! कौन है जो मेरा बगीचा खराब कर रहा है? रुक वहीं!" और वह चीकू के पीछे दौड़ने लगा।
चीकू डर के मारे कांपने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कहाँ भागे। तभी उसे पास ही एक पुराना मिट्टी का घड़ा दिखाई दिया। चीकू बिना सोचे-समझे उस घड़े के अंदर छिप गया। मालिक घड़े के पास से गुजरा, लेकिन चीकू को देख नहीं पाया। जब मालिक चला गया, तब चीकू धीरे से बाहर निकला और भागकर अपने घर पहुँच गया।
घर पहुँचने पर माँ ने चीकू का पसंदीदा खाना बनाया था। लेकिन चीकू इतना डर गया था और इतना थक गया था कि वह कुछ खा भी नहीं सका। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने सोचा कि काश उसने माँ की बात मानी होती।
Moral
बड़ों की चेतावनी को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।