एक बड़े शहर में एक महान विद्वान ज्ञान देने आए थे। लगातार तीन दिनों तक वे लोगों को उपदेश दे रहे थे। लोगों को सिखाने के उत्साह में वे अपने भोजन और आराम का ध्यान ही नहीं रख रहे थे। पास ही काम करने वाले एक गरीब माली ने जब यह देखा, तो उसे बहुत चिंता हुई।
माली धीरे से विद्वान के पास गया और बोला, "महाराज, आप घंटों से बोल रहे हैं। मुझे लगता है कि आपको भूख लगी होगी। क्या मैं आपके लिए कुछ भोजन ला सकता हूँ?"
विद्वान ने मुस्कुराकर कहा, "हाँ, ज़रूर। मुझे सादा भोजन चाहिए।"
माली थोड़ा हिचकिचाया और बोला, "महाराज, मैं एक साधारण माली हूँ। मेरे पास बहुत कम भोजन है। यहाँ कई अमीर व्यापारी और राजा भी आए हैं। वे आपको बहुत अच्छा भोजन दे सकते हैं, कहीं मेरा साधारण भोजन आपको पसंद न आए।"
यह सुनकर एक अमीर व्यापारी बोला, "हम आपके लिए एक भव्य भोज का आयोजन कर सकते हैं, आप इस माली का खाना क्यों चाहते हैं?"
लेकिन विद्वान ने शांति से उत्तर दिया, "भूख केवल पेट की नहीं, मन की भी होती है। जहाँ सब लोग भव्य दावत देने की सोच रहे थे, वहीं इस व्यक्ति ने सबसे पहले मेरी ज़रूरत को समझा। मुझे भव्य भोजन नहीं, बल्कि इस व्यक्ति का प्रेम और यह सादा भोजन चाहिए।"
विद्वान की बात सुनकर वहाँ मौजूद सभी लोग उस माली की निस्वार्थ भावना देखकर दंग रह गए। विद्वान ने बड़े चाव से वह सादा भोजन ग्रहण किया।
Moral
दूसरों की आवश्यकता को सच्चे मन से समझना ही सबसे बड़ा गुण है।