एक सुंदर गाँव में एक बड़ा उत्सव चल रहा था। गाँव के प्रिय नेता, आनंद जी, मंच पर खड़े होकर लोगों को संबोधित कर रहे थे। सभी लोग उन्हें बड़े ध्यान से सुन रहे थे।
तभी, भीड़ में से किसी ने एक छोटी सी पोटली फेंकी। वह पोटली आनंद जी की ओर आ रही थी, लेकिन वे एक पल के लिए हट गए, जिससे वह उनके सहायक के कंधे पर लगी और ज़मीन पर गिर गई। पोटली फटने से उसमें से गोबर बिखर गया।
यह देखकर भीड़ गुस्से से भर गई। "कोई हमारे नेता का अपमान करने की कोशिश कर रहा है! उस अपराधी को तुरंत पकड़ो!" एक व्यक्ति चिल्लाया। लोग उस व्यक्ति को ढूँढने के लिए तैयार हो गए।
जैसे ही माहौल तनावपूर्ण हुआ, आनंद जी ने शांति से माइक उठाया। "कृपया शांत हो जाइए। किसी को भी क्रोधित होने की आवश्यकता नहीं है," उन्होंने कोमल स्वर में कहा।
"लेकिन सर!" एक महिला ने कहा, "उन्होंने आप पर गंदगी फेंकी है!"
आनंद जी मुस्कुराए और बोले, "इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह गोबर था या कुछ और? आइए हम इसे फूलों की पोटली मान लें। क्रोध की कड़वाहट से बेहतर फूलों की खुशबू होती है।"
उनकी इस महान सोच को देखकर लोगों का गुस्सा शांत हो गया। जो लोग बदला लेने के लिए तैयार थे, वे अब आनंद जी की उदारता देखकर दंग रह गए।
Moral
क्रोध पर दया और धैर्य की जीत होती है।