पुराने समय में, विक्रम नाम का एक विद्वान था जो बच्चों के लिए एक बड़ा स्कूल बनाना चाहता था। इसके लिए वह कई धनवान लोगों से मदद मांग रहा था। एक दिन वह शहर के सबसे अमीर और घमंडी व्यापारी वर्धन के पास गया।
जब विक्रम ने स्कूल के बारे में बताया, तो वर्धन को बहुत गुस्सा आया। उसने चिल्लाकर कहा, "क्या तुम्हें लगता है कि मेरा धन तुम्हारे इस छोटे से काम के लिए है?" गुस्से में आकर उसने अपना कीमती रेशमी दुपट्टा निकालकर विक्रम के पैरों के पास फेंक दिया और कहा, "इसे उठाओ और यहाँ से चले जाओ!"
विक्रम बिल्कुल नहीं घबराया। उसने बहुत शांति से उस दुपट्टे को उठाया, उसे तह किया और वहाँ से चला गया। वर्धन उसे जाते हुए देखता रहा, उसे विक्रम के धैर्य पर हैरानी हुई।
विक्रम सीधे शहर के सबसे बड़े बाज़ार में पहुँचा। उसने ज़ोर से घोषणा की, "भाइयों और बहनों! देखो यह अनमोल चीज़! यह हमारे महान व्यापारी वर्धन का रेशमी दुपट्टा है! जो भी इसे खरीदना चाहता है, वह बोली लगाए!"
बाज़ार में भीड़ जमा हो गई। जब यह खबर वर्धन तक पहुँची, तो वह डर गया। उसने सोचा, "अगर किसी ने इसे बहुत कम दाम में खरीद लिया, तो मेरी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी!"
उसने तुरंत अपने सेवक को भेजा और कहा, "जाओ और इस दुपट्टे को कितनी भी ऊँची कीमत पर खरीद लो, पर इसे कम दाम में मत होने देना!"
सेवक ने बाज़ार में जाकर बहुत बड़ी धनराशि देकर वह दुपट्टा खरीद लिया। विक्रम ने उस धन का उपयोग स्कूल बनाने के लिए किया। वर्धन को समझ आया कि उसके अहंकार ने उसे न केवल आर्थिक नुकसान पहुँचाया, बल्कि उसे बुद्धिमान व्यक्ति से मात भी खिला दी।
Moral
धैर्य और बुद्धि से बड़ी से बड़ी मुश्किल को अवसर में बदला जा सकता है।