एक घने जंगल में सिम्बा नाम की एक लोमड़ी रहती थी। सिम्बा बहुत चालाक थी, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी—वह बहुत जल्दबाज़ी करती थी। वह बिना सोचे-समझे कोई भी काम कर बैठती थी।
एक दोपहर, सिम्बा को बहुत तेज़ भूख लगी थी। उसने पूरे जंगल में खाने की तलाश की, लेकिन उसे कुछ नहीं मिला। भूख के मारे उसका बुरा हाल था। तभी उसे एक पुराने पेड़ के पास मिट्टी का एक घड़ा दिखाई दिया।
जैसे ही सिम्बा घड़े के पास पहुँची, उसे उसमें से बहुत स्वादिष्ट भोजन की खुशबू आई। 'वाह! कितना लाजवाब स्वाद है!' सिम्बा ने लालच में आकर सोचा। उसने यह सोचे बिना कि वह बाहर निकल पाएगी या नहीं, अपना सिर घड़े के संकरे मुँह के अंदर डाल दिया और मजे से खाना खाने लगी।
पेट भरने के बाद, जब सिम्बा बाहर निकलने के लिए झपटी, तो वह डर गई! खाना खाने के बाद उसका सिर थोड़ा फूल गया था, जिसके कारण वह घड़े के संकरे छेद में फंस गई। उसने बहुत कोशिश की, खूब खींचा, लेकिन उसका सिर बाहर नहीं निकला।
सिम्बा घबरा गई और रोने लगी। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सोचा, 'काश! मैंने थोड़ा धैर्य रखा होता। अगर मैं पहले ही देख लेती कि मैं बाहर निकल पाऊँगी या नहीं, तो आज यह मुसीबत न आती।' काफी देर तक संघर्ष करने के बाद, एक दूसरे जानवर की मदद से वह बाहर निकल पाई। उस दिन सिम्बा ने एक बड़ा सबक सीखा।