एक शांत गाँव में रामू नाम का एक किसान रहता था। उसके घर के पास एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ था, जहाँ कौवों का एक बड़ा झुंड रहता था। रोज़ सुबह कौवों के 'काँव-काँव' करने से रामू की नींद खुल जाती थी। वह अक्सर चिढ़कर कहता, 'ये कौवे भी न, सुबह-सुबह सारा शोर मचा देते हैं!' फिर भी, दयावश वह रोज़ उनके लिए थोड़ा सा अनाज पेड़ के नीचे डाल देता था।
एक बार गर्मी के मौसम में, रामू के खेतों पर संकट आ गया। टिड्डियों का एक बहुत बड़ा दल उड़ता हुआ आया और देखते ही देखते फसल को बर्बाद करने लगा। रामू ने उन्हें भगाने की बहुत कोशिश की, लेकिन टिड्डियों की संख्या इतनी ज़्यादा थी कि वह हार गया। अपनी मेहनत को बर्बाद होते देख वह उदास होकर खेत के किनारे बैठ गया।
तभी, बरगद के पेड़ से कौवों का झुंड नीचे आया। उन्होंने देखा कि खेत को नुकसान हो रहा है, तो वे एक-एक करके टिड्डियों पर हमला करने लगे। कौवे अपनी चोंच से टिड्डियों को पकड़कर खाने लगे। कौवों की इस फुर्ती से टिड्डियाँ डरकर भाग गईं और खेत सुरक्षित हो गया।
रामू यह सब देखकर दंग रह गया। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने सोचा, 'मैं तो इन्हें केवल शोर मचाने वाला समझता था, लेकिन आज इन्होंने मेरी मदद करके मेरा कर्ज उतार दिया।' उस दिन के बाद से, रामू ने कौवों को अपना दुश्मन नहीं, बल्कि अपने खेत का रक्षक मान लिया।
Moral
की गई छोटी सी भलाई भी कभी न कभी बड़े रूप में वापस आती है।