चंद्रपुर साम्राज्य में एक बड़ी चोरी हुई थी। राजमहल के खजाने से कीमती हीरे गायब थे। राजा और उनके सैनिकों ने बहुत खोज की, लेकिन चोर का कोई सुराग नहीं मिला। बस महल के द्वार के पास घोड़े के पैरों के कुछ निशान मिले।
राजा ने अपने बुद्धिमान सलाहकार विवेक को बुलाया। विवेक ने उन निशानों को ध्यान से देखा और भीड़ की ओर देखकर ज़ोर से कहा, 'ये निशान किसी साधारण घोड़े के नहीं हैं! चोर ने अपने घोड़े के पैरों में बहुत मोटे लोहे के नाल लगाए हैं, इसीलिए ये निशान सामान्य से बड़े दिख रहे हैं। इसलिए, बड़े नाल वाले घोड़े की तलाश करो!'
भीड़ में छिपा हुआ चोर, कवि, यह सुनकर बुरी तरह डर गया। उसने सोचा, 'अगर मैंने ये बड़े नाल नहीं बदले, तो मैं पकड़ा जाऊँगा!' वह तुरंत घर भागा और बड़े नालों को हटाकर बहुत छोटे और पतले नाल लगा दिए।
अगले दिन, सैनिकों ने गाँव के हर अस्तबल की जाँच की। बाकी घोड़ों के नाल सामान्य थे, लेकिन कवि के घोड़े के नाल असामान्य रूप से बहुत छोटे थे। सैनिकों ने तुरंत पहचान लिया कि यही वह चोर है और उसे पकड़कर राजा के पास ले आए।
कवि को समझ आ गया कि विवेक ने उसे डराने के लिए वह बात कही थी। अपनी चोरी छिपाने की कोशिश में कवि ने खुद ही अपनी पहचान उजागर कर दी।
Moral
अपराध करने वाला व्यक्ति डर के मारे ऐसी गलतियाँ करता है जो उसे पकड़वा देती हैं।