एक घने जंगल के किनारे, कवि नाम के एक खरगोश ने एक छोटा और प्यारा सा घर बनाया। कवि एक सीधा-साधा प्राणी था, उसे दिखावे की कोई चाह नहीं थी। एक दिन, उसके दोस्त लियो लोमड़ी और पिप गिलहरी उसका नया घर देखने आए।
जैसे ही वे अंदर आए, लियो ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, "अरे कवि! यह घर है या कोई छोटा सा बिल? यहाँ तो सांस लेने की भी जगह नहीं है!"
पिप गिलहरी ने इधर-उधर देखते हुए शिकायत की, "कवि, क्या तुम्हें पसंद-नापसंद की समझ नहीं है? एक अच्छे घर में बड़ा आँगन, खाना जमा करने के लिए ढेर सारी जगह और मेहमानों के बैठने के लिए बड़ी जगह होनी चाहिए। यह छोटा सा घर तो बहुत ही बेकार है!"
वे दोनों लगातार घर के आकार, सुविधाओं और बनावट की कमियाँ निकालते रहे। कवि चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा। अंत में लियो ने कहा, "पता नहीं तुमने ऐसा घर क्यों बनाया!"
कवि ने शांति से मुस्कुराते हुए कहा, "दोस्तों, आप सही कह रहे हैं। यह घर छोटा है और इसमें सुख-सुविधाएँ भी कम हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं मेरी असली चिंता क्या है? मेरी चिंता यह है कि इस छोटे से कमरे में बैठने जितने सच्चे दोस्त भी मेरे पास नहीं हैं। मैं चाहे कितना भी बड़ा महल बना लूँ, अगर मेरे पास खुशियाँ बाँटने के लिए दोस्त नहीं होंगे, तो वह घर हमेशा खाली ही लगेगा।"
कवि की बात सुनकर लियो और पिप शर्म से झुक गए। उन्हें समझ आ गया कि घर की दीवारों से ज़्यादा ज़रूरी रिश्तों की गर्माहट होती है।
Moral
घर ईंटों से बनता है, लेकिन परिवार और दोस्तों से बनता है।