नीले पर्वत के जंगल में बालू नाम का एक भालू रहता था। वह दूसरे भालुओं की तुलना में काफी मोटा था, इसलिए जंगल के अन्य जानवर अक्सर उसका मज़ाक उड़ाते थे। बंदर कहते, 'देखो, गोल-मटोल बालू आ रहा है!'
बालू इन बातों पर ध्यान नहीं देता था। एक दिन उसने आसमान में एक चील को उड़ते देखा और कहा, 'प्यारी चील, तुम कितनी आज़ाद हो! काश मैं भी तुम्हारी तरह आसमान में उड़ पाता।' यह सुनकर सभी पक्षी ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। उन्होंने कहा, 'भालू होकर उड़ना? यह तो नामुमकिन है!' बालू को बुरा लगा, पर वह चुप रहा।
तभी जंगल में एक बड़ी मुसीबत आ गई। यात्रियों द्वारा छोड़ी गई एक छोटी सी आग सूखी पत्तियों में फैल गई और देखते ही देखते भीषण जंगल की आग बन गई। धुएँ के कारण पक्षी ऊँचा नहीं उड़ पा रहे थे और छोटे जानवर आग के घेरे में फँस गए थे।
सब डर के मारे चिल्लाने लगे। तब बालू आगे आया और बोला, 'डरो मत! सब मेरे ऊपर चढ़ जाओ, मैं तुम्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाऊँगा।' एक बूढ़े चील ने चेतावनी दी, 'बालू, तुम्हारे शरीर पर बहुत बाल हैं, आग तुम्हें पकड़ सकती है। यह खतरनाक है!'
लेकिन बालू ने हार नहीं मानी। उसने अपनी गुफा में जमा किया हुआ शहद अपने पूरे शरीर पर मल लिया। शहद की उस परत ने उसके शरीर के लिए एक सुरक्षा कवच का काम किया। पक्षियों को अपने बालों में छिपाकर और छोटे जानवरों को अपनी गोद में उठाकर बालू तेज़ी से आग के बीच से दौड़ पड़ा।
जब सब सुरक्षित पहुँच गए, तो सभी जानवरों को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने कहा, 'बालू, हमें माफ़ कर दो। हमने तुम्हारे शरीर का मज़ाक उड़ाया, लेकिन आज तुमने ही हमारी जान बचाई।' उस दिन के बाद से बालू जंगल का सबसे प्यारा दोस्त बन गया।
Moral
किसी के रूप का मज़ाक न उड़ाएं; असली ताकत साहस और दयालुता में होती है।