एक घने जंगल के किनारे एक तालाब में कवि नाम का एक कछुआ रहता था। कवि को अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था। वह जंगल के अन्य जानवरों को देखकर अक्सर उनका मज़ाक उड़ाता था और कहता था, 'तुम सब कितने धीमे हो! देखो मेरा कवच कितना मज़बूत है, इसे कोई नहीं तोड़ सकता!'
एक दोपहर, कवि एक पत्थर पर बैठा आसमान में उड़ते हुए पक्षियों को देख रहा था। उसे जलन महसूस हुई। उसने सोचा, 'कितना अन्याय है! अगर मैं भी उड़ पाता, तो बादलों के बीच से दुनिया कितनी सुंदर दिखती!'
तभी एक विशाल बाज उड़ता हुआ आया और पास की एक टहनी पर बैठ गया। कवि ने एक चालाकी सोची और बाज से कहा, 'हे शक्तिशाली बाज! मेरा भी मन आसमान में उड़ने का करता है। क्या तुम मुझे अपनी पीठ पर बैठाकर दुनिया की सैर करा सकते हो?'
yaaz ने पूछा, 'अगर मैं तुम्हें अपनी पीठ पर ले जाऊँ, तो मुझे क्या मिलेगा?'
कवि ने झूठ बोलते हुए कहा, 'मुझे एक गुप्त खजाने का पता मालूम है। अगर तुम मुझे वहाँ ले जाओगे, तो मैं उस खजाने का आधा हिस्सा तुम्हें दे दूँगा।'
लालच में आकर बाज ने कछुए को अपनी पकड़ में लिया और आसमान की ऊंचाइयों में उड़ने लगा। कछुआ खुशी से चिल्ला रहा था, 'वाह! मैं उड़ रहा हूँ!' लेकिन बाज समझ गया था कि कछुआ झूठ बोल रहा है। बाज ने उसे सबक सिखाने का फैसला किया।
जब वे एक ऊँची चट्टान के पास पहुँचे, तो बाज ने हवा के एक तेज़ झोंके के बीच कछुए को थोड़ा झटक दिया। कछुआ नीचे की ओर गिरा और झाड़ियों में जा टकराया। कछुआ बच तो गया, लेकिन उसके उस मज़बूत कवच में, जिस पर उसे बहुत गर्व था, गहरी दरारें आ गईं।
कवि दर्द से कराह उठा, 'मैंने दूसरों को धोखा देकर खजाना पाने की कोशिश की, और अब मेरा अपना कवच ही टूट गया। यह मेरी गलती की सजा है।' उस दिन के बाद से, कवि ने कभी झूठ नहीं बोला और सभी के साथ विनम्रता से रहने लगा।
Moral
दूसरों को धोखा देकर लाभ कमाने की कोशिश करने वाले अंत में खुद ही नुकसान उठाते हैं।