एक घने जंगल में लोमड़ियों का एक झुंड रहता था। उसी झुंड में कवि नाम की एक लोमड़ी थी। कवि के पिछले पैर में चोट लगने के कारण वह अन्य लोमड़ियों की तरह तेज़ी से शिकार नहीं कर पाती थी। इस वजह से बाकी लोमड़ियाँ उसे बहुत कम भोजन देती थीं। अपमानित महसूस करते हुए, कवि ने अकेले भोजन की तलाश में जंगल से दूर जाने का फैसला किया।
एक शाम, पास के गाँव के पास खाना ढूँढते समय, कवि गलती से एक बड़े बर्तन में गिर गई। उस बर्तन में काला रंग भरा हुआ था। जब कवि बाहर निकली, तो उसका पूरा शरीर गहरा काला हो चुका था। जब वह जंगल वापस आई, तो अन्य जानवर उसे देखकर डर के मारे भाग गए। उन्होंने सोचा कि वह कोई भयानक जीव है।
नदी किनारे पानी पीने के दौरान कवि ने अपना प्रतिबिंब देखा और उसे एक चालाकी सूझी। उसने सोचा, "अगर सब मुझे डरावना जीव समझेंगे, तो वे मेरी सेवा करेंगे!" वह एक ऊँची चट्टान पर खड़ी हुई और ज़ोर से चिल्लाई, "जंगल के वासियों, सुनो! मैं एक विशाल छाया-दानव हूँ! अगर तुम रोज़ मेरे लिए अच्छा भोजन नहीं लाओगे, तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा!"
डरे हुए जानवरों ने उसकी बात मान ली और रोज़ उसके लिए फल और मांस लाने लगे। कवि एक राजा की तरह रहने लगी। लेकिन एक रात बहुत तेज़ बारिश हुई। मूसलाधार बारिश में कवि के शरीर का सारा काला रंग धुल गया। अगली सुबह जब जानवरों ने देखा कि वह तो एक साधारण लोमड़ी है, तो वे बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने कवि को जंगल से भगा दिया। कवि को अपनी गलती का अहसास हुआ।
Moral
धोखे से मिली सफलता क्षणिक होती है, सच्चाई कभी न कभी सामने आ ही जाती है।