एक बड़े शहर में साइलस नाम का एक व्यापारी रहता था। साइलस के पास बहुत धन था, लेकिन उसका मन लालच से भरा था। वह हमेशा दूसरों को धोखा देकर और अधिक कमाने की योजना बनाता रहता था।
एक सुबह, साइलस बाज़ार जाने के लिए पचास सोने के सिक्कों से भरी एक थैली तैयार करता है। लेकिन रास्ते में जंगल के मार्ग से गुजरते समय, उसकी थैली कमर से फिसलकर घास में गिर जाती है। साइलस को इसका पता ही नहीं चलता।
साइलस और उसके बेटों ने दो दिनों तक उस रास्ते पर बहुत खोज की, लेकिन उन्हें सोने का एक भी सिक्का नहीं मिला। उसी समय, पास के जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करने आई माया नाम की एक छोटी लड़की ने झाड़ियों के पास कुछ चमकता हुआ देखा। उसने जब थैली उठाई, तो देखा कि वह सोने के सिक्कों से भरी थी।
माया तुरंत वह थैली अपने पिता के पास ले गई। उसके पिता ने थैली पहचानी और उसे साइलस के पास ले गए। उन्होंने खुशी से कहा, "श्रीमान, आपकी खोई हुई थैली मिल गई है!"
लेकिन साइलस ने धन्यवाद देने के बजाय, थैली खोली और चिल्लाने लगा, "इसमें तो सिर्फ पचास सिक्के हैं! मेरी थैली में तो सत्तर सिक्के थे! तुम मुझे धोखा देने की कोशिश कर रही हो!"
माया और उसके पिता बहुत दुखी हुए। उन्होंने इतनी ईमानदारी दिखाई, फिर भी उन पर चोरी का आरोप लगाया गया। मामला गाँव के न्यायाधीश के पास पहुँचा।
न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को सुना। उन्होंने साइलस से पूछा, "तुम्हारी थैली में कितने सिक्के थे?" साइलस ने कहा, "सत्तर सिक्के!"
फिर उन्होंने माया से पूछा, "तुम्हें थैली में कितने सिक्के मिले?" माया ने धीरे से कहा, "पचास सिक्के, श्रीमान।"
न्यायाधीश मुस्कुराए और अपना फैसला सुनाया। "यदि साइलस की थैली में सत्तर सिक्के थे, तो यह पचास सिक्कों वाली थैली उसकी नहीं हो सकती। इसलिए, यह सोना इस ईमानदार लड़की का हुआ!"
साइलस को अपनी लालच की भारी कीमत चुकानी पड़ी। माया को उसकी ईमानदारी के लिए इनाम मिला, जबकि साइलस के पास केवल झूठ ही बचा।
Moral
लालच का फल बुरा होता है, जबकि ईमानदारी का फल मीठा होता है।