एक बड़े शहर में सोमनाथ नाम का एक बहुत अमीर आदमी रहता था। उसके पास अपार धन-संपत्ति और सुख-सुविधाएँ थीं। एक दिन उसने शहर के लोगों और पत्रकारों को इकट्ठा किया और एक अजीब घोषणा की।
"आने वाले सोमवार को, मैं अपनी नई शानदार कार और सोने के सिक्कों से भरा एक संदूक अपनी अंतिम विदाई में मिट्टी में दफन कर दूँगा," उसने कहा।
यह सुनकर लोग हैरान रह गए। उन्होंने आपस में कानाफूसी की कि क्या वह पागल हो गया है। एक बुजुर्ग व्यक्ति ने आगे बढ़कर पूछा, "आप इतनी बड़ी संपत्ति को मिट्टी में क्यों दफन कर रहे हैं?"
सोमनाथ ने शांति से उत्तर दिया, "चूंकि मैं इन चीजों को अपने साथ नहीं ले जा सकता, इसलिए इन्हें जमीन के नीचे ही रहने देना बेहतर है।"
यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। लोग उसका मजाक उड़ाने लगे और पत्रकार इस घटना को कवर करने के लिए उमड़ पड़े। जब वह दिन आया, तो एक बड़ी भीड़ समारोह में इकट्ठा हुई।
भीड़ के सामने खड़े होकर सोमनाथ ने पूछा, "क्या इन कीमती चीजों को हमेशा के लिए दफन होते देख आपका दिल दुख रहा है?"
"हाँ, यह बहुत बड़ी बर्बादी है!" भीड़ ने एक साथ कहा।
तब सोमनाथ ने मुस्कुराते हुए पूछा, "तो फिर मुझे यह बताइए, जब किसी व्यक्ति की आँखें, हृदय या अन्य अंग दफन कर दिए जाते हैं, तो आपको दुख क्यों नहीं होता? वे अंग किसी दूसरे की जान बचा सकते हैं और उन्हें नया जीवन दे सकते हैं। क्या वे इस सोने से कहीं अधिक मूल्यवान नहीं हैं?"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। उन्हें समझ आया कि सोना और कारें केवल वस्तुएं हैं जो मिट्टी में पड़ी रहेंगी, लेकिन अंग दान वह उपहार है जो दूसरों को जीवन देता है। जो लोग उसका मजाक उड़ाने आए थे, वे अब सम्मान में खड़े थे। उन्हें समझ आ गया कि सोमनाथ पागल नहीं, बल्कि एक बुद्धिमान व्यक्ति था जिसने जीवन का एक बड़ा पाठ सिखाया।
Moral
भौतिक संपत्ति की तुलना में अंग दान कहीं अधिक मूल्यवान है।