एक शांत तालाब के किनारे बत्तखों का एक झुंड रहता था। उस झुंड में एक बत्तख अपने अंडों से बच्चों के निकलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी। कुछ दिनों बाद, नन्हे-नन्हे बत्तख के बच्चे एक-एक करके अंडों से बाहर आने लगे। लेकिन सबसे अंत में जो बच्चा निकला, वह देखने में बहुत अलग था। वह आकार में बड़ा था और उसके पंख बाकी बच्चों जैसे नहीं थे।
तालाब की अन्य बत्तखें उस नए बच्चे का मज़ाक उड़ाती थीं। "तुम कितने अजीब दिखते हो! तुम्हें हमारे साथ नहीं रहना चाहिए," वे कहती थीं। दूसरों की कड़वी बातों से दुखी होकर, वह बच्चा तालाब छोड़कर कहीं दूर चला गया। वह एक खुले मैदान में अकेला ही बड़ा होने लगा और हमेशा उदास रहता था कि वह दूसरों जैसा क्यों नहीं है।
समय बीतता गया और वह पक्षी अब बड़ा हो गया था। एक दिन, एक साफ नदी के किनारे बैठकर वह रो रहा था। वह सोच रहा था, "मैं इतना अलग और बदसूरत क्यों हूँ? मैं सुंदर क्यों नहीं हूँ?"
तभी, सफेद हंसों का एक सुंदर झुंड वहां उड़कर आया। उनकी सुंदरता देखकर वह पक्षी दंग रह गया। एक हंस उसके पास आया और बड़े प्यार से पूछा, "दोस्त, तुम इतने उदास क्यों हो?"
उसने रोते हुए कहा, "मैं एक बहुत ही अजीब और बदसूरत पक्षी हूँ।" हंस मुस्कुराया और बोला, "तुम जैसा सोचते हो, तुम उससे कहीं ज्यादा सुंदर हो। क्यों न तुम उस साफ पानी में अपना चेहरा देखकर आओ?"
वह पक्षी धीरे से पानी के पास गया और अपना चेहरा देखा। अपनी परछाई देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं! वह कोई बदसूरत बत्तख नहीं था, बल्कि एक बहुत ही सुंदर और सफेद हंस था! उसे एहसास हुआ कि वह दूसरों की गलत बातों की वजह से इतने सालों तक दुखी रहा। खुशी के साथ, उसने अपने पंख फैलाए और हंसों के झुंड के साथ उड़ चला।
Moral
दूसरों की बातों से अपनी पहचान न बनाएं; अपनी असली कीमत को पहचानें।