एक सुंदर से गाँव में कन्नन नाम का एक बहुत ही बुद्धिमान लड़का रहता था। वह पढ़ाई में बहुत तेज़ था, लेकिन उसमें एक बुराई थी—उसे लगता था कि वह जो कुछ भी करता है, वह केवल अपनी मेहनत और बुद्धि से करता है। एक दिन जंगल के पास खेलते समय, उसकी मुलाकात एक वृद्ध ज्ञानी व्यक्ति से हुई, जिनके पास एक अजीब सा दर्पण था। उन्होंने कहा, 'कन्नन, यह दर्पण तुम्हें तुम्हारा असली रूप दिखाएगा।'
कन्नन ने उत्सुकता से दर्पण में देखा। लेकिन उसे अपना चेहरा नहीं, बल्कि अपना अहंकार और वह क्षण दिखाई दिए जब उसने दुनिया की महानता को नज़रअंदाज़ किया था। कन्नन घबरा गया। वृद्ध व्यक्ति ने समझाया, 'जिस बुद्धि में उस परम शक्ति के प्रति समर्पण नहीं है जो इस संसार को चलाती है, वह उस हाथ की तरह है जिसमें संवेदना ही न हो। वह शरीर का हिस्सा तो है, पर काम का नहीं।'
कन्नन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझा कि उसकी बुद्धि तभी सार्थक है जब उसमें विनम्रता हो। उस दिन के बाद, उसका अहंकार मिट गया और उसके मन में ईश्वर और प्रकृति के प्रति श्रद्धा जाग गई।