एक शांत गाँव में कवि नाम का एक लड़का अपने दादाजी के साथ रहता था। उसके दादाजी बहुत ज्ञानी थे। एक शाम डूबते सूरज को देखते हुए कवि ने पूछा, "दादाजी, यह दुनिया कितनी बड़ी है! हम इस जीवन के सफर को कैसे पूरा करेंगे?"
दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटा कवि, जीवन एक विशाल समुद्र की तरह है। इसमें कभी शांति होगी, तो कभी बड़ी लहरें और तूफान भी आएंगे। इस समुद्र को पार करने के लिए हमें एक मजबूत नाव की जरूरत होती है।"
कवि उलझन में पड़ गया, "लेकिन दादाजी, हमारे पास तो कोई नाव नहीं है!"
दादाजी ने कवि का हाथ थामकर कहा, "वह नाव लकड़ी की नहीं, बल्कि ईश्वर पर तुम्हारे विश्वास और समर्पण की है। जब हम ईश्वर के चरणों में खुद को सौंप देते हैं, तो हम इस जीवन रूपी सागर में कभी नहीं डूबते। ईश्वर ही वह पतवार है जो हमें सुरक्षित किनारे तक ले जाती है।"
कुछ दिनों बाद, कवि को एक कठिन परिस्थिति का सामना करना पड़ा। वह बहुत डर गया था। तभी उसे दादाजी की बातें याद आईं। उसने अपनी आँखें बंद कीं और शांति से ईश्वर का ध्यान किया। उसे महसूस हुआ कि उसके भीतर एक अद्भुत शक्ति आ गई है। उसने समझ लिया कि बाहरी तूफानों से लड़ने के लिए ईश्वर पर अटूट विश्वास ही सबसे बड़ी नाव है।