एक सुंदर से गाँव में अर्जुन और मीरा नाम के दो दोस्त रहते थे। अर्जुन को हमेशा नई चीज़ों, खिलौनों और मिठाइयों का लालच रहता था। मीरा के पास लकड़ी की एक सुंदर गुड़िया थी जो उसके पिता ने उसे दी थी। एक दिन, अर्जुन ने शरारत में मीरा की गुड़िया छिपा दी, जिससे मीरा रोने लगी।
तभी गाँव में एक महात्मा आए। वे बहुत ही शांत और सरल स्वभाव के थे। उन्हें दुनिया की किसी भी चीज़ का मोह नहीं था। उन्होंने अर्जुन को पास बुलाकर समझाया, 'बेटा अर्जुन, ये खिलौने और चीज़ें तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन मन की शांति हमेशा साथ रहती है। तुम इन छोटी चीज़ों के पीछे क्यों भाग रहे हो?'
महात्मा की आँखों में जो चमक और शांति थी, उसे देखकर अर्जुन दंग रह गया। उसने महसूस किया कि महात्मा ने अपनी सभी इच्छाओं को त्याग दिया है। उनकी महानता का वर्णन करना वैसा ही है जैसे दुनिया में जितने लोग मर चुके हैं, उन्हें गिनना—जो कि असंभव है। अर्जुन को अपनी गलती का अहसास हुआ, उसने मीरा से माफी मांगी और उसकी गुड़िया वापस कर दी। उस दिन से उसने अनावश्यक लालच छोड़ दिया।