एक शांत गाँव में करी नाम का एक लड़का अपने दादाजी के साथ रहता था। करी बहुत होनहार था, लेकिन उसकी एक समस्या थी—उसका मन बहुत भटकता था। चमकती हुई चीज़ें देखते ही उसकी आँखें वहीं ठहर जातीं और पड़ोसियों की बातें सुनते ही उसके कान वहाँ लग जाते। वह किसी भी काम को पूरा नहीं कर पाता था।
एक दिन, उसके दादाजी ने उसे चंदन की एक छोटी सी लकड़ी दी और कहा, 'करी, क्या तुम इससे एक सुंदर पक्षी बना सकते हो?' करी ने उत्साह से काम शुरू किया। लेकिन कुछ ही देर में, खिड़की के बाहर एक रंगीन तितली उड़ती दिखी। करी की आँखें तितली के पीछे चली गईं और उसने औज़ार छोड़ दिए। फिर बाहर बच्चों के शोर ने उसका ध्यान भटका दिया। कई दिन बीत गए, पर वह लकड़ी वैसी ही रही।
दादाजी ने उसे पास बिठाया और समझाया, 'करी, तुम्हारी इंद्रियाँ जंगली घोड़ों की तरह हैं। अगर तुम उन्हें खुला छोड़ दोगे, तो वे तुम्हें कहीं भी ले जाएँगी। लेकिन अगर तुम बुद्धि की लगाम से उन्हें नियंत्रित करोगे, तो तुम अपनी मंज़िल तक पहुँच पाओगे।'
करी को बात समझ आ गई। अगली बार जब वह काम कर रहा था, तो सुंदर चीज़ें दिखने पर भी उसने अपना ध्यान नहीं भटकाया। उसने धीरे-धीरे अपनी एकाग्रता बनाए रखी और उस लकड़ी से एक बहुत ही सुंदर पक्षी तराश दिया। दादाजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि आज करी ने सिर्फ लकड़ी नहीं, बल्कि खुद पर विजय प्राप्त की है।