एक शांत गाँव में सोमू नाम का एक किसान रहता था। उसका एक बेटा था जिसका नाम तंबी था। सोमू के पास काफी ज़मीन और मवेशी थे। लेकिन सोमू अक्सर अपने बेटे से कहता था, 'तंबी, यह सोना और ज़मीन जो मैंने जमा की है, वह एक दिन खत्म हो सकती है, लेकिन तुम्हारे द्वारा किए गए अच्छे कर्म ही मेरी असली संपत्ति होंगे।'
तंबी एक बहुत ही समझदार और दयालु लड़का था। एक साल गाँव में भीषण सूखा पड़ा। तालाब सूख गए और फसलें बर्बाद हो गईं। सोमू के खेत भी सूखने लगे। ऐसे कठिन समय में, तंबी ने अपनी छोटी सी बचत से गाँव के जानवरों के लिए चारा और किसानों के लिए बीज खरीदे। उसने अपने खेत में एक छोटा सा कुआँ भी खोदा और उसका पानी दूसरे ज़रूरतमंद किसानों के साथ साझा किया।
तंबी के इस निस्वार्थ कार्य से पूरा गाँव उसका सम्मान करने लगा। सोमू का नाम भी पूरे इलाके में मान-सम्मान के साथ लिया जाने लगा। सोमू को तब समझ आया कि सोना या ज़मीन से मिलने वाली प्रतिष्ठा से कहीं बढ़कर उसके बेटे के अच्छे कार्यों से मिला यह सम्मान है। तंबी ही उसकी असली दौलत था।