एक शांत गाँव में रवि नाम का एक संगीतकार रहता था। वह बाँसुरी और वीणा बजाने में बहुत माहिर था। उसकी मधुर धुन सुनकर पूरा गाँव मंत्रमुग्ध हो जाता था। एक दिन उसका मित्र सोमू उससे मिलने आया। सोमू ने कहा, 'रवि, तुम्हारी बाँसुरी की तान कितनी सुरीली है! यह दुनिया का सबसे मधुर संगीत है।'
तभी रवि का तीन साल का बेटा, कविन, लड़खड़ाते कदमों से कमरे में आया। उसने तुतलाते हुए कहा, 'पापा... दूध...' रवि को उस बच्चे की वह टूटी-फूटी बोली किसी दिव्य संगीत की तरह लगी। रवि ने मुस्कुराते हुए कविन को गोद में उठा लिया।
सोमू ने हंसते हुए पूछा, 'रवि, इस बच्चे के शोर में तुम्हें क्या संगीत सुनाई दे रहा है?'
रवि ने बड़े प्यार से उत्तर दिया, 'सोमू, तुम बाँसुरी और वीणा की मिठास का आनंद ले रहे हो, जो कि बहुत अच्छी बात है। लेकिन तुमने अभी तक एक बच्चे की तुतली बोली का जादू नहीं सुना है। एक माता-पिता के लिए, बच्चे के वे शब्द दुनिया के सबसे सुंदर संगीत से भी बढ़कर होते हैं।'
सोमू को समझ आ गया कि असली मधुरता वाद्ययंत्रों में नहीं, बल्कि बच्चों की मासूम आवाज़ों में होती है।