एक शांत गाँव में माधव नाम का एक किसान अपनी पत्नी मीरा के साथ रहता था। एक शाम, माधव ने अपने बगीचे की ताज़ा सब्ज़ियों से बहुत स्वादिष्ट भोजन बनाया। खाने की खुशबू पूरे घर में महक रही थी।
जैसे ही वे खाने बैठने वाले थे, दरवाज़े पर दस्तक हुई। माधव ने दरवाज़ा खोला तो देखा कि एक थका हुआ यात्री खड़ा है। माधव के मन में एक पल के लिए संकोच हुआ। उसने सोचा, 'हमारे पास खाना बहुत कम है, अगर हमने इसे साझा किया तो शायद हमें भूख लगेगी।'
मीरा ने माधव की हिचकिचाहट देख ली और धीरे से कहा, 'माधव, अगर हम अमृत भी खा रहे हों, तो भी किसी भूखे अतिथि को बाहर भेजना गलत है। असली खुशी बांटने में है।'
माधव को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने तुरंत उस यात्री को प्यार से घर के अंदर बुलाया और भरपेट भोजन कराया। जब वह यात्री तृप्त होकर गया, तो माधव और मीरा को जो खुशी मिली, वह उस भोजन के स्वाद से कहीं बढ़कर थी। उन्होंने सीखा कि मिल-बाँटकर खाने में ही असली तृप्ति है।