एक छोटे से गाँव में माधव नाम का एक किसान अपनी पत्नी मीरा के साथ रहता था। एक साल भयंकर सूखा पड़ा, जिससे उनकी फसल बर्बाद हो गई। घर में बहुत कम अनाज बचा था।
एक शाम, जब वे खाना खाने की तैयारी कर रहे थे, एक बूढ़ा यात्री उनके द्वार पर आया। वह बहुत थका हुआ और भूखा लग रहा था। माधव ने मीरा से धीरे से कहा, 'हमारे पास तो बस एक ही वक्त का खाना है। अगर हमने इसे अतिथि को दे दिया, तो हमें आज भूखा सोना पड़ेगा।'
मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, 'हम जो प्रेम और भोजन देते हैं, उससे उस व्यक्ति को कितनी शांति मिलती है, हम उसका अंदाजा नहीं लगा सकते। वही असली धन है।' उन्होंने मिलकर उस वृद्ध को बड़े आदर के साथ भोजन कराया।
भोजन करने के बाद, वृद्ध की आँखों में एक अद्भुत चमक थी। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी दया ने न केवल मेरा पेट भरा, बल्कि मेरी आत्मा को भी तृप्त कर दिया।' उस रात माधव और मीरा भूखे तो थे, लेकिन उस वृद्ध की संतुष्टि देखकर उनका मन एक असीम शांति से भर गया। उन्हें समझ आया कि उनके द्वारा किए गए उपकार का मूल्य अनाज से नहीं, बल्कि अतिथि की मुस्कान से मापा जा सकता है।